पानी का व्रत
पानी का व्रत
लेखक: संजय शर्मा
गर्मियों की पहली लू चली और हवा में जलती धूल घुल गई। सूरज, आसमान में दहकता हुआ अंगारा बन गया। नदी की सतह दरकने लगी, उसकी मछलियाँ छटपटाने लगीं। कुएँ के गर्भ में बचे आख़िरी घूँट को चटखती मिट्टी ने निगल लिया। बावड़ी के पत्थर तपने लगे, जैसे किसी ने उनके सीने पर अंगारे रख दिए हों। तालाब की लहरें सिकुड़कर मरुस्थल में बदलने लगीं। घरों के नल टपकने के बजाय कराहने लगे, और खेतों की मिट्टी ऐसी सूख गई जैसे किसी की आस टूट गई हो।
लेकिन शहर में लोग अब भी बेपरवाह थे।
बाथरूम के शावर से रोज़ सैकड़ों लीटर पानी बहाया जाता था, दाँत ब्रश करते हुए नल खुले छोड़ दिए जाते थे। स्विमिंग पूल्स लबालब भरे रहते थे, जबकि गलियों में बच्चे प्यास से तड़पते थे। मॉडर्न किचन के RO सिस्टम से निकला बेकार पानी सीधा नाली में चला जाता था, और प्यासे परिंदे आसमान में भटकते रह जाते थे। आधी पी हुई पानी की बोतलें कचरे में पड़ी रहती थीं, और घरों में पोछा लगाने के लिए बाल्टियों में पानी बेझिझक उड़ेला जाता था।
धरती ने घबराकर पूछा, "क्या हुआ? तुम सब चुप क्यों हो?"
नदी ने गहरी, थकी हुई साँस ली और फुसफुसाई, बहना बंद कर दिया है !
"हमने व्रत रख लिया है..."
"व्रत? किसलिए?" पेड़-पौधों ने आश्चर्य से पूछा।
"जब तक इंसान हमें समझेगा नहीं, हमें आदर नहीं देगा, तब तक हम न बहेंगे, न बरसेंगे, न किसी की प्यास बुझाएँगे।"
"जब तक हमें सिर्फ़ एक वस्तु समझा जाएगा, जब तक हमें नल खुला छोड़कर, नदियों में कचरा फेंककर, अनावश्यक रूप से बहाकर अपमानित किया जाएगा—हम मौन रहेंगे।" पानी की बूंदों ने रोष में उत्तर दिया।
अब पानी नहीं था।
यह आधुनिक शहर था—गगनचुंबी इमारतों वाला, जहाँ ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ आकाश से बातें करती थीं। जहाँ 50 मंज़िला अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोग अपने चमचमाते पैंटहाउस में एक दिन में टनों पानी बहाते थे। जहाँ सुबह कार धोने के लिए पाइप खुला छोड़ दिया जाता था, बाथटब में घंटों पानी बहता था, और वाटर पार्कों में हजारों लीटर पानी यूँ ही उड़ाया जाता था। जहाँ शादी-ब्याह में फव्वारों से खेला जाता था, और रोज़ाना हजारों बोतलें आधी पीकर फेंक दी जाती थीं।
लेकिन अब !
नल खोलते ही बस हवा निकलती थी। स्विमिंग पूल्स सूख गए थे, टैंकरों के आगे लंबी कतारें लग गई थीं। प्यास ने अमीर-गरीब का भेद मिटा दिया था। अब कोई फव्वारों के नीचे खड़ा होकर सेल्फी नहीं ले सकता था, क्योंकि अब पानी था ही नहीं।
इसी शहर में एक 10 साल का बच्चा था—आदित्य।
उसकी छोटी-सी बाल्टी में चंद बूंदें बची थीं, जिनसे वह एक पौधा सींच रहा था। उसे पानी का महत्व उसके दादाजी ने बताया था। दादाजी कहते थे, "जब मैं तुम्हारी उम्र का था, हर घर में सबसे पहले मेहमान को पानी दिया जाता था। घर के बाहर मटके रखे जाते थे। कुएँ से खींचकर लाए गए हर घड़े की कीमत समझी जाती थी। पानी सिर्फ तरल नहीं था, यह जीवन था।"
आदित्य ने दादाजी की बातें दिल से लगा ली थीं। वह हर बूंद को संजोता, अपने हाथ धोने के लिए भी बस उतना ही पानी लेता जितना ज़रूरी हो। जब उसके दोस्त वाटर गन से खेलते, वह उन्हें समझाता कि पानी खेल का साधन नहीं, जीवन का आधार है।
एक दिन जब शहर सूख चुका था, आदित्य ने अपनी छोटी बाल्टी उठाई, और धीरे-धीरे अपने घर की बालकनी में गया।
नीचे का नज़ारा भयानक था—लोग पानी के लिए भटक रहे थे, हाथ में बोतलें लिए एक-एक घूँट के लिए तरस रहे थे। गगनचुंबी इमारतों के टॉप फ्लोर पर रहने वालों को टैंकर भी नहीं मिल रहे थे। प्यास बढ़ती गई, और पानी का व्रत और कठोर होता गया।
कुछ दिन बाद, जब पूरा शहर पानी के लिए तड़प रहा था, आदित्य ने एक निर्णय लिया। उसने अपनी माँ के किचन से बचा हुआ पानी एक बाल्टी में इकट्ठा किया, फिर अपने अपार्टमेंट के हर घर से वह बचा हुआ पानी माँगने लगा, जो रोज़ बर्तन धोते समय, बोतलों में बचा रह जाता था, या जिसे लोग बेपरवाही से नाली में बहा देते थे।
देखते ही देखते, आदित्य के पास कई बाल्टियाँ भर गईं।
अब वह अकेला नहीं था—उसकी कॉलोनी के और भी बच्चे उसके साथ हो लिए।
वे सब अपनी-अपनी बाल्टियों में बचा हुआ पानी लेकर सड़कों पर निकल पड़े। आदित्य ने अस्पताल के बाहर खड़े मजदूरों को पानी दिया, ट्रैफिक सिग्नल पर बैठे भिखारी को घूँट-घूँट कर पिलाया। एक पार्क में गए, जहाँ सूखी घास पर तड़पते पंछियों को देखकर उन्होंने पानी रखा। मंदिर के बाहर प्यासे श्रद्धालुओं को, रिक्शा खींचने वालों को, सबको थोड़ा-थोड़ा पानी दिया।
धीरे-धीरे यह दृश्य पूरे शहर में फैलने लगा।
जो लोग कल तक पानी की किल्लत पर सिर्फ बातें कर रहे थे, वे अब खुद अपने घरों से पानी इकट्ठा कर दूसरों को बाँटने लगे।
शहर में पहली बार, पानी को व्यर्थ बहाने के बजाय, उसकी एक-एक बूँद को संजोने की भावना जागी।
पानी यह देखकर मुस्कुराया। उसे एहसास हुआ कि उसका व्रत अब टूट सकता है। इंसान ने उसे सिर्फ एक संसाधन नहीं, जीवन का आधार समझना शुरू कर दिया था।
आसमान पर घने बादल छा गए।
लेकिन जैसे ही यह हुआ, एक अजीब-सी सिहरन पूरे शहर में फैल गई। हवा में हल्की-सी नमी महसूस हुई। परिंदों ने सिर उठाकर आसमान की ओर देखा। सूखी टहनियों में कंपन हुआ।
बादलों ने दूर से गरजकर कहा, "शायद इंसान ने पहली बार हमें ,अपने सच्चे दिल से पुकारा है। शायद व्रत तोड़ने का समय आ रहा है... लेकिन अभी नहीं।"
उस रात, शहर के हर घर में एक नई हलचल थी। सोशल मीडिया पर पानी की बचत की शपथ ली जा रही थी, बच्चों ने अपने माता-पिता को पानी की फिजूलखर्ची के लिए टोकना शुरू कर दिया था। स्विमिंग पूल्स खाली रहने लगे, RO से निकले बेकार पानी को इकट्ठा किया जाने लगा, लोग नल खोलने से पहले सोचने लगे।
और फिर, तीसरे दिन, जब शहर के हर व्यक्ति ने पानी की कद्र करनी शुरू कर दी—तब कहीं जाकर, पानी ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, "अब व्रत तोड़ने का समय आ गया है।"
पहली बारिश की बूंदें गिरीं और धरती ने सिहरकर कहा, "अब हम इसे संभाल कर रखेंगे। अब हम इसे व्यर्थ नहीं जाने देंगे।"
लेकिन पानी ने जाते-जाते एक चेतावनी दी—"अगर फिर से तुमने हमें अनदेखा किया, बर्बाद किया, हमें बेइज़्ज़त किया, तो यह व्रत हमेशा के लिए होगा। और उस दिन, जब तुम पुकारोगे, हम सुन नहीं पाएँगे।"
शहर में फिर से जीवन लौट आया था। पर क्या यह चेतावनी काफी थी? या फिर एक दिन पानी को फिर से व्रत रखना पड़ेगा?
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About the Author:
Sanjay Shharma is a writer and cultural commentator dedicated to bridging ancient wisdom with modern life. With a passion for exploring how traditional practices can empower personal growth and self-discovery, his work invites readers to challenge conventions and embrace transformation. Drawing on years of experience and personal insight, Sanjay inspires his audience to rediscover their inner strength and live authentically in a fast-paced world.

Excellent, a step ahead beyond imagination.
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