मोक्ष: बस यहीं, बस अभी

 

मोक्ष: बस यहीं, बस अभी

लेखक : संजय शर्मा 

रामायण में, जब राम वनवास को जाते हैं, तो वो राजशाही, आराम और ऐश-ओ-आराम को बिना किसी झिझक के छोड़ देते हैं। लेकिन जब उनके पिता दशरथ की मृत्यु होती है, तो राम टूट जाते हैं। वो रोते हैं, याद करते हैं, उस चौखट की कमी महसूस करते हैं—एक बेटे की तरह, एक इंसान की तरह। फिर भी—राम चलते रहते हैं। शोक, वनवास, और संताप—सब के बीच चलते रहते हैं। यही है मर्यादा पुरुषोत्तम—परफेक्ट इंसान, जो भावनाओं को महसूस तो करता है, लेकिन उसका मालिक नहीं बनता। ऐसी ही आवाज़ मेरे अंदर गूंजती रही—धीरे-धीरे। तब तक, जब तक मेरा समय आ गया इसे समझने का।

मैं सोचता था कि मोक्ष तो सिर्फ साधुओं को ही मिलता है। जिसके लिए घर-बाहर छोड़ना, व्यापार या कार्य छोड़ना ज़रूरी होगा। मैंने सोचा, खैर, ये तो हिमालय और तपस्या की बात है। लेकिन ज़िंदगी ने एक अलग ही गुरू भेजा—मेरे ही घर में।

वो थे मेरे पिताजी।

मेरे बाबूजी न तो कभी कोई धर्मोपदेशक बने, न ही कोई कर्म-कांड, पूजा इत्यादि किया; पर दशकों तक उनके जीवन में एक अजीब सी स्थिरता बनी रही—जैसे जलते हुए दीपक का प्रकाश, जो दिन, रात, मौसम से प्रभावित न हो।

जब उन्होंने अपना फैसला किया कि अब उनका समय पूरा हो चुका है, तो स्वयं से अपना शरीर त्यागा। वे बिना शोर-शराबे के चले गए—अद्भुत, चुप्पी और सम्मान के साथ। मैंने पिता खोया, उसी क्षण मेरा आइना टूटा—जिससे मैं खुद को देखता था। उनके चले जाने के बाद हर सुबह मेरी आदत बन गई थी—कुछ उनकी वापसी की उम्मीद रखना: कुर्सी का एक आवाज़, उनकी आवाज़ दूर से सुनाई देना—और फिर खामोशी, जिसमें अभी भी उनके होने की गूंज होती थी।

एक साल छह महीने गुजर गए, पर उनकी “अनुपस्थिति” अब मेरे जीवन में एक उपस्थिति बन चुकी है। खिड़की से आती हलकी हवा, अख़बार की खड़क, कमरे में खामोशी—ये सब अब उन्हीं के महसूस की गई चीजें हैं, न की मेरी। मैं हर दिन छोटे-छोटे तरीकों से उनसे मिलता हूं—कैसे गिलास से पानी पीना, हर पत्ते को स्पर्श करना, किसी से सच्चे मन से बात करना। ये 'साधारण जीना' बाबूजी से मिली शुरुआत है।

धीरे-धीरे मैंने देखा—मैंने अब 'कम चाहना' शुरू कर दिया है। कम बोलना, कम साबित करना। पहले मैं तमाम टाइटल्स, तारीफें, सोशल मीडिया पर दिखावा करता था—मैं चाहता था कि लोग मुझे ‘कुछ’ समझें। अब वो सब जैसे परते हो चली हों।

दुनिया का खिंचाव अभी भी है—“तुम ये लिखो”, “यह भी शेयर करो”, या “ये क्यों नहीं पोस्ट किया?”, “अपनी किताब क्यों नहीं छापते?” लेकिन अब कहीं उत्तर देने की जल्दबाज़ी नहीं होती, एक शांत “हाँ” होती है, और सब अंदर रह जाता है।

क्योंकि अब मैं ‘छाप छोड़ने’ से ज्यादा ‘खामोशी छोड़ने’ में रुचि रखता हूँ। पहले लगता था कि नाम, यश ही काफी है; अब समझ आता है — सच्ची विरासत वही है जो आत्मा में ठहर जाए, न कि लोग याद रखें।

बाबूजी ने अपने जाने का अर्थ ही बदल दिया—उन्होंने नाम नहीं छोड़ा, उन्होंने छोड़ना छोड़ा,—हर ढांचे, हर मान्यता, हर उम्मीद से मुक्त। अगर दूसरों को ये किसी आध्यात्मिक शिविर या अनुष्ठान लगता है—तो मेरे लिए उनके जाने का असली मायना है—'मोक्ष'—जो उन्होंने जीवित रहते हुए ही प्राप्त कर लिया।

मैं फर्क देख सकता हूँ—मैं व्यवसाय में वहीं हूँ, परिवार वहीं, पर भीतर मैंने एक जगह बनाई है—वहाँ, जहां मैं हूं, सिर्फ मैं। अब मैं धीरे से ज़िंदगी से निकलता नहीं, उसमें गहराई से उतरता हूँ। हल्का, धीमा, सजग—जो कभी कुछ बनना चाहता था, जो भी हासिल करना चाहता था—अब वो सब मूल रूप में शांत हो गया है।

राम, जो मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, जब अपने पिता दशरथ की मृत्यु पर शोक करते हैं—तो वे इंसान बन जाते हैं, सबके जैसे उनको भी पीड़ा होती है। और फिर लंका विजय के बाद जब देवता पुष्प वर्षा करते हैं, दशरथ भी हर्षित हो स्वर्ग से राम पर पुष्प वर्षा करते हैं, तो राम उनसे कहते हैं:
“पिताजी, अब छोड़ दीजिए। यह खुशी भी, यह गर्व भी—इनको छोड़िए। जब तक आप हर बंधन से मुक्त नहीं होंगे, हर बंधन से त्याग नहीं करेंगे, तब तक मोक्ष कहाँ?”

अब, जब मैं पीछे देखता हूं, तो जानता हूं—बाबूजी ने वही किया जो राम अपने पिता से कह रहे थे। उन्हें कोई कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उन्होंने पहले ही त्याग दिया था—हर पहचान, हर अहंकार, हर भूमिका—यहाँ तक कि देह का भी मोह। उन्होंने वो देह भी दे दी—दूसरों को सिखाने के लिए। उन्होंने वो जीया जो दशरथ को समझाया गया। और मैं पूरी श्रद्धा से कह सकता हूँ, बाबूजी ने मोक्ष पाया। क्योंकि अब उन्हें कुछ चाहिए नहीं था। अब कुछ पाना बाकी नहीं था। वो पहले ही मुक्त थे।

मोक्ष कहीं और नहीं, यह यहीं है—इस चाय की चुस्की में, इस खामोशी में, इस सांस में, इस ‘चुप’ में। और अब यह धीरे-धीरे मेरे भीतर भी हो रहा है। और मैं जानता हूं, अगर मैं सजग और साधारण बना रहूं, तो ये और गहराता जाएगा।

यह कोई उपलब्धि नहीं, यह वापसी है।

और शायद, अगर आप भी थोड़ी देर रुकें, तो आप भी उसे सुनेंगे—छोड़ देने की आवाज़। घर लौटने की आवाज़।

आज के समय में जब हम हर दिन कुछ न कुछ पाने की दौड़ में लगे रहते हैं—कामयाबी, मान-सम्मान, रिश्तों में स्वीकृति, और सोशल मीडिया पर स्वीकार्यता—तब यह समझना और भी ज़रूरी हो गया है कि हम क्या-क्या अपने भीतर जमा कर चुके हैं। और उनमें से कितना वास्तव में हमारा है?

यही क्षण है सोचने का, रुकने का, और मोक्ष को एक जीवन-प्रक्रिया के रूप में अपनाने का। यह लेख एक निमंत्रण है—एक आमंत्रण खुद से जुड़ने का, धीरे-धीरे उस हल्केपन की ओर बढ़ने का, जो शांति देता है। कोई संन्यास नहीं चाहिए—सिर्फ ईमानदारी, सादगी और भीतर की आवाज़ सुनने की हिम्मत।

इस रास्ते पर चलना केवल आत्मा को नहीं, हमारे पूरे अस्तित्व को छू जाता है। मानसिक रूप से एक स्पष्टता आने लगती है—जैसे कोई धुंध हट रही हो। भावनात्मक रूप से हम हल्के हो जाते हैं, क्योंकि अब हम हर भावना को पकड़ने की कोशिश नहीं करते। शरीर पर भी इसका असर होता है—तनाव कम, साँस गहरी, नींद बेहतर। और सबसे बड़ा बदलाव आता है मन में—एक शांत और स्थिर मन, जो अब हर छोटी चीज़ में सुख पा सकता है।
यही वो सम्पूर्ण स्वास्थ्य है, जो केवल योग से नहीं, बल्कि मोक्ष की समझ से उपजता है।

राम, दशरथ और बाबूजी के जीवन से हम बार-बार यही सीखते हैं कि मुक्ति भागने से नहीं, धीरे-धीरे छोड़ने से मिलती है।
आप पूरी तरह जीवन जी सकते हैं, गहराई से महसूस कर सकते हैं, सच्चे दिल से प्रेम कर सकते हैं—और फिर भी पूरी तरह आज़ाद रह सकते हैं।
बस ज़रूरत है एक ऐसी उपस्थिति की जिसमें पकड़ न हो। ऐसी भावना की जिसमें उलझाव न हो। ऐसी शांति की जिसमें अलगाव नहीं, गहराई हो।

यह लेख कोई निष्कर्ष नहीं, एक विनम्र शुरुआत है।
एक निमंत्रण है—अपने आप के पास लौटने का।
आज एक चीज़ छोड़कर देखिए।
किसी शांति को खोजने की जगह, उसमें रहना शुरू कीजिए।

क्योंकि मोक्ष कोई भविष्य नहीं।
वह अभी है—जब आप चाय की चुस्की लेते हैं, किसी का हाथ थामते हैं, या बस पूरी जागरूकता से साँस लेते हैं।


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लेखक परिचय

संजय शर्मा एक साधक हैं, जीवन के कथाकार हैं, और समय की परतों में छिपे सत्य को रोज़मर्रा की झलकियों में देखने वाले एक सजग दृष्टा। भारतीय ज्ञान परंपरा और अपने निजी अनुभवों से गहराई लेकर वे ऐसी बातें लिखते हैं जो कुछ नया नहीं, बल्कि हमारे भीतर पहले से मौजूद स्मृति को जगा देती हैं।

उनकी लेखनी न तो दिखावा करती है, न दिशा देती है—बल्कि याद दिलाती है कि हमें कुछ और बनने की नहीं, बस वापस अपने भीतर लौटने की जरूरत है।

सादगी, मौन और आत्मीयता के माध्यम से वे हमें आमंत्रित करते हैं — उस व्यक्ति को फिर से पहचानने के लिए, जो हम पहले से ही हैं।


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