वो, मैं हूँ

 वो, मैं हूँ

लेखक: संजय शर्मा 


कभी-कभी बिना किसी साफ वजह के थकावट महसूस होती है —
काम की नहीं, बल्कि दिखावे की थकावट।
मजबूत दिखने की, खुश दिखने की, सब कुछ संभालने का ढोंग करने की।

और तब…एक पल को सब कुछ रुक जाता है। ना कोई फ़ोन बजता है, ना कोई विचार चलता है…
बस एक ख़ामोशी उतरती है — और उसी ख़ामोशी में कोई धीरे से कहता है:
“तू भूल गया है… तू कौन है।”

ये आवाज़ चिल्लाती नहीं। ना ज़ोर डालती है, ना डराती है।
बस इंतज़ार करती है —कि तू सुने… तू याद करे… खुद को।

वो कहती है —
“तेरे अंदर जो रौशनी है, वो तू भूल गया… लेकिन वो अब भी वहीँ है।”
ना किसी मंदिर में, ना किसी पहाड़ पर- वो तो तेरे भीतर ही है,
शांत… स्थिर… अडिग।

धीरे-धीरे एक एहसास लौटने लगता है —मैं उतना कमज़ोर नहीं जितना मैंने खुद को समझ लिया था। मैं उतना मजबूर नहीं जितना दिखता हूँ।मैं बस भूल गया था कि मैं कौन हूँ।

फिर भीतर से आवाज़ आती है —
“तू वही है… जो हर तूफ़ान में भी नहीं डगमगाता।”
“तू शिव है… तू अभय है।”

और यहीं से शुरू होती है मेरी असली यात्रा
डर से नहीं, बल्कि स्मृति से चलती हुई यात्रा। स्मरण की, आत्म-चेतना की, और उस लौ की जो हर साँस में जल रही है -पर मैंने ही उस पर पर्दा डाल रखा था।

‘मैं शिव हूँ’ — इसका अर्थ यह नहीं कि मैं कोई देवता हूँ,
बल्कि यह कि मेरे भीतर भी वही चेतना है —जो साक्षी भाव में देखती है, मगर उलझती नहीं।

‘शिव’ का अर्थ है —वो जगा हुआ हिस्सा, जो हर ग़लती को भी प्यार से देखता है, हर डर को चुपचाप थाम लेता है, हर दुख में साथ बैठता है।

जब ग़ुस्सा आता है — वो चुपचाप देखता है।
जब आँसू आते हैं — वो थाम लेता है।
जब हँसी आती है — वो मुस्कुरा देता है।
जब मैं भटकता हूँ — वो दरवाज़े पर माँ की तरह इंतज़ार करता है।

और जब ये समझ आता है… तो दिल से निकलता है — “मैं शिव हूँ।”

और मैं अभय हूँ… क्योंकि मैं शिव हूँ।
डर अब भी आता है। पर अब वो मुझे पकड़ नहीं पाता।क्योंकि अब मैं जानता हूँ —डर मेरा स्वभाव नहीं… बस एक बीता हुआ भ्रम है।

अब जब मुश्किलें आती हैं —मैं दौड़ता नहीं, रुकता हूँ। भीतर झाँकता हूँ। साँस लेता हूँ…और कहता हूँ -"मैं भूल गया था… पर अब याद आ गया है।"

और तब मेरी दाहिनी कलाई में बँधा रुद्राक्ष मुझे उसी शक्ति की याद दिलाता है —जो हमेशा से मेरे साथ थी। वो सिर्फ़ एक माला नहीं है…वो मेरा भरोसा है… मेरी रीढ़ है…जो हर बार मेरे भीतर की आवाज़ को फिर से उठा देती है —‘तू शिव है… तू अभय है।’

अब पूजा में फूल, जल, धूप की ज़रूरत नहीं रहती। हर साँस एक अर्पण है। हर कर्म एक आरती। हर क्षण एक दर्शन

अब ना किसी को कुछ दिखाने की ज़रूरत है,
ना भगवान को खुश करने के लिए चढ़ावा चढ़ाने की।
क्योंकि माता-पिता को प्रसाद नहीं चाहिए — उन्हें सिर्फ़ भरोसा चाहिए।

“मात-पिता तुम मेरे…” — अब ये प्रार्थना सच में समझ आती है।
बचपन से सुनते थे, अब हम सब गाते हैं  —
"मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी..."
पर अब समझ आता है, ये ईश्वर को बताने के लिए नहीं था —बल्कि खुद को याद दिलाने के लिए था।

क्योंकि जब वो मेरा पिता है —तो मैं क्या हूँ?
मैं उसका अंश। उसका रूप। उसकी संतान।

जैसे शर्मा जी का बेटा भी शर्मा कहलाता है, गुप्ता जी की बेटी — गुप्ता।
तो मैं क्यों नहीं शिव ?

अब मुझे खुद से भागना नहीं… खुद को याद करना है। ना किसी उपवास की ज़रूरत है, ना किसी अनुष्ठान की।
क्योंकि अब मुझे पता है —जिसे मैं बाहर खोज रहा था, वो तो मेरे अंदर बैठा है।

अब ना ज़ोर से पुकारता हूँ, ना आँसू बहाता हूँ…
बस चुप हो जाता हूँ — और सब सुनाई देने लगता है।

अब मैं जानता हूँ
मैं शिव हूँ - इसलिए मैं अभय हूँ।
मैं हूँ - और बस यही काफ़ी है।

और जब ये याद रोज़ लौटती है…तो जीवन बदलता नहीं -नज़रिया बदल जाता  है 
हर रिश्ता एक स्पर्श लगता है। हर दुख — एक समझ। हर क्षण — एक साधना।

अब मुझे खुद को साबित करने की ज़रूरत नहीं।ना किसी और को बदलने की।अब बस एक एहसास रह गया है -
हर दिन, हर पल -खुद को फिर से याद करना।

मैं शिव हूँ। मैं अभय हूँ। अब यह कोई बात कह देने भर की चीज़ नहीं- यह मेरी सांसों में बसी हुई स्मृति है। जिसे मैं रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके फिर से जीना सीख रहा हूँ। मैं अब कुछ बनने की दौड़ में नहीं हूँ। न किसी को मनाने की ज़रूरत है, न खुद को साबित करने की। हर दिन, हर साँस अब एक अवसर है -याद करने का।

और मैं चाहता हूँ कि हमारे बच्चे ,सब अपने -इस चमकते, छलकते आधुनिक संसार में ,जहाँ हर कोना दिखावे, लालच, और उलझनों से भरा है - वहाँ वे खुद से ये पूछना न भूलें: क्या मैं याद  रख पा रहा हूँ कि मैं कौन हूँ?

संशय से मत भागो। दिखावे से मत बहको। तुम जो हो, वो सबसे गहरा सच है। उसे बाहर मत खोजो, भीतर टटोलो। और तुम्हारी रीढ़ सीधी तभी रहेगी, जब तुम्हें याद रहेगा कि तुम क्या नहीं हो- और क्या सदा से रहे हो। इस दुनिया में बहुत कुछ खींचेगा- सुख, शक्ति, संपत्ति, पर तुम टिके रहना। चकाचौंध से नहीं, भीतर की लौ से रोशनी लेना।  हर बार रुकना, साँस लेना, और खुद से पूछना - ' मैं कौन हूँ ?' और जवाब अगर मौन में मिले, तो उसे मत तोड़ना। वही तुम्हारी असली पहचान है।

मन से हारना नहीं । बहकना नहीं । क्योंकि तुम ही  शिव हो। तुम  ही  अभय हो। तुम्हें किसी और की तरह बनने की ज़रूरत नहीं —
बस अपने भीतर झाँकने की हिम्मत चाहिए।

शिवत्व तुम्हारे भीतर है —उसे महसूस करो, और अपने जीवन को निर्भयता से जीओ।

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एक प्रार्थना - सुनेने के लिया क्लिक करें ---नमो नमो शंकरा


लेखक परिचय

संजय शर्मा एक साधक हैं, जीवन के कथाकार हैं, और समय की परतों में छिपे सत्य को रोज़मर्रा की झलकियों में देखने वाले एक सजग दृष्टा। भारतीय ज्ञान परंपरा और अपने निजी अनुभवों से गहराई लेकर वे ऐसी बातें लिखते हैं जो कुछ नया नहीं, बल्कि हमारे भीतर पहले से मौजूद स्मृति को जगा देती हैं।

उनकी लेखनी न तो दिखावा करती है, न दिशा देती है—बल्कि याद दिलाती है कि हमें कुछ और बनने की नहीं, बस वापस अपने भीतर लौटने की जरूरत है।

सादगी, मौन और आत्मीयता के माध्यम से वे हमें आमंत्रित करते हैं — उस व्यक्ति को फिर से पहचानने के लिए, जो हम पहले से ही हैं।


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