दीवारें बोलती हैँ

दीवारें बोलती हैं

हर घर की अपनी कहानी होती है। वहाँ रहने वाले लोगों की हँसी, आँसू, सपने और यादें इन दीवारों में बस जाती हैं। दीवारें निर्जीव लग सकती हैं, लेकिन वे सब कुछ महसूस करती हैं और अपने भीतर समेटे रहती हैं। कभी किसी घर में जाते ही घुटन-सी महसूस होती है, तो किसी और घर में कदम रखते ही मन हल्का और सुकून भरा लगता है। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हर घर अपने रहने वालों की भावनाएँ सोखता है और उन्हें लौटाता भी है। जहाँ प्यार और अपनापन हो, वहाँ दीवारें भी मानो हँसती हैं। जहाँ कलह और उदासी हो, वहाँ की दीवारें भी थकी-हारी सी लगती हैं।

कभी छुआ है अपने घर की दीवारों को? हमारी ही तरह वे भी कभी गरम, कभी ठंडी होती हैं। जब घर में खुशी हो, तो दीवारें भी हल्की और खुली-खुली लगती हैं। जब तनाव हो, तो वही दीवारें बोझिल लगने लगती हैं। और कभी-कभी, ये दीवारें हमें वही सुनाती हैं जो इस घर में रहने वाले हमारे दिवंगत बुज़ुर्ग कहा करते थे। ध्यान से देखना, इन दीवारों में वही मुस्कान मिलेगी, वही शब्द सुनाई देंगे, वही अपनापन महसूस होगा। क्योंकि घर की दीवारें हमारे बुज़ुर्गों जैसी ही तो होती हैं—चुपचाप, लेकिन हर सुख-दुख में हमारे साथ।

लेकिन अब घर सिर्फ़ दीवारों तक सिमट गए हैं, घरपन कहीं खो गया है। पहले घर आत्मा से जुड़े होते थे, अब वे सिर्फ़ दिखावे के लिए रह गए हैं। महंगे इंटीरियर, ग्लास, स्टील, पीवीसी और कृत्रिम चीजों से बने ये घर भले ही शानदार दिखें, लेकिन क्या इनमें कोई एहसास बचा है? पुराने ज़माने में घर मिट्टी, लकड़ी और चूने से बनते थे, जो हमारी भावनाओं को अपने अंदर सोखकर हमें वापस लौटाते थे। अब के घर पूरी तरह कृत्रिम चीजों से बने हैं—क्या ये कभी किसी की भावनाओं को समझ पाएँगे?

अब हर किसी के पास अपना कमरा और अपनी अलग दुनिया है। पहले जहाँ पूरा परिवार साथ बैठता था, अब सबके बीच अनदेखी दीवारें खिंच गई हैं। क्या हम अब भी पहले जैसा अपनापन महसूस कर पाते हैं? क्या एक ही पीढ़ी तक सीमित रहने वाले अपार्टमेंट परिवार की परंपराओं और मूल्यों को सहेज सकते हैं? परिवार का असली सुख तभी है जब हर पीढ़ी एक साथ हो, लेकिन आजकल ज़्यादातर जवान बच्चे विदेश या बड़े शहरों में बस चुके हैं। जाना तो ज़रूरी है, लेकिन जब वे जाएँ, अपने घर की मिट्टी, एहसास, संस्कार और अपनापन साथ ले जाएँ, जैसे कोई कुंभ से जल लाकर अपने घर रखता है। ये भावनाएँ और संस्कार उनके नए घरों की उन दीवारों में भी जीवन भरें, ताकि वे भी बोल सकें।

पर जो पीछे छूट गए हैं? बड़े से घर, उसमें बंद खाली कमरे, न वहाँ कभी उजाला होता है, न ही वहाँ की दीवारें ठीक से साँस ले पाती हैं। एक समय जो घर हँसी-खुशी से गूँजता था, अब वहाँ दो बूढ़ी परछाइयाँ दीवारों से बातें करती हैं, जैसे वे ही उनके सबसे करीबी दोस्त हों।

कुछ घर ऐसे भी हैं जहाँ इतना कुछ ठूँस दिया गया है कि वहाँ की दीवारें भी बोझ में दबी हुई बस कराहती हैं, और उसमें रहने वाले भी। बेतरतीब चीज़ों से भरे घरों की दीवारें ही नहीं घुटतीं, वहाँ रहने वाले लोग भी घुटन महसूस करते हैं। घर कितना भी बड़ा हो, अगर उसमें खुलकर साँस लेने की जगह न हो, अगर उसमें अपनापन न हो, तो वह सिर्फ़ ईंट और पत्थर का ढाँचा रह जाता है।

एक दिन एक परिचित, जो एक आलीशान बंगले में रहता है, हमारे घर आया। कुछ देर बातचीत की, चाय पी, और जब वह वापस गया, तो उसकी पत्नी ने कहा कि उसका मन फिर से यहाँ आने को कर रहा है। उसे हमारे घर में अजीब-सा सुकून और अपनापन महसूस हुआ। उनका अपना घर भले ही बड़ा था, लेकिन शायद वह जीवंत नहीं था।

यह हम पर निर्भर करता है कि हम अपने घर का माहौल कैसा बनाते हैं। अगर हम प्यार, स्नेह और खुशियों से उसे भरते हैं, तो घर भी वैसा ही महसूस होता है। वास्तव में, वास्तु सिर्फ़ दिशाओं और संरचनाओं का ज्ञान नहीं, बल्कि ऊर्जा, भावनाओं और अपनापन से जुड़ा विज्ञान है। जिस घर में प्रेम, समर्पण और सकारात्मक सोच होती है, वहाँ दीवारें भी सुकून देती हैं। और जहाँ मनमुटाव, स्वार्थ और असंतोष होता है, वहाँ वास्तु दोष खुद-ब-खुद जन्म ले लेता है। दीवारें केवल ईंट-गारे की बनी चीज़ें नहीं होतीं, वे हमारे रिश्तों, विचारों और संस्कारों की गवाह होती हैं। जब भी किसी घर में जाएँ, उसकी दीवारों को महसूस करने की कोशिश करें।

क्योंकि दीवारें सच में बोलती हैं!

About the Author

Sanjay Shharma is an engineer and management graduate, a second-generation entrepreneur with over 35 years of experience. A creator of products, markets, teams, and institutions, he blends modern innovation with deep-rooted Indian cultural values. His strong connection to the earth and his commitment to community development shape his perspectives on business, technology, and society.He can be reached at sanjay@gepco.in.


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