SOCIAL IS ANTISOCIAL
Social is Antisocial
रात के 11 बजे थे। अंशुल बेड पर लेटा हुआ बेसब्री से अपने फोन की स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए था। उसने कुछ घंटे पहले ही अपनी एक नई फोटो इंस्टाग्राम पर डाली थी—समुद्र किनारे खड़े होकर डूबते सूरज की खूबसूरत पृष्ठभूमि में मुस्कुराता हुआ। कैप्शन था: "Lost in the moment, finding myself."
लेकिन सच्चाई?
अंशुल उस पल में नहीं जी रहा था। वह पूरी ट्रिप के दौरान परफेक्ट फोटो लेने के लिए परेशान था। "अरे, यह एंगल सही नहीं है, एक और लेते हैं!" "नहीं, मेरे चेहरे पर सही रोशनी नहीं आ रही!" उसकी ट्रिप का ज़्यादातर समय मोबाइल स्क्रीन में कैद होकर रह गया। अब, बेड पर लेटे हुए, वह बार-बार अपनी पोस्ट को रीफ्रेश कर रहा था। 120 लाइक्स... 135... 142... लेकिन यह काफी नहीं था। "यार, पिछली पोस्ट पर 200 पार हो गए थे, इस बार क्या हुआ?" उसने एक अजीब-सी बेचैनी महसूस की।
यह अकेले अंशुल की कहानी नहीं है। यह हम सबकी कहानी है। लेकिन यह हाल क्यों हुआ? क्या सच में सोशल मीडिया हमें जोड़ रहा है या हमें अपने ही दायरे में कैद कर रहा है?
सोशल मीडिया एक साधारण तकनीक के रूप में शुरू हुआ—लोगों को जोड़ने के लिए, उन्हें बातचीत और जानकारी साझा करने का मंच देने के लिए। लेकिन धीरे-धीरे यह एक मायाजाल बन गया, जिसमें फंसकर लोग अपनी असली पहचान और खुशी खोते जा रहे हैं।
पहले फेसबुक आया, जिसने दूर बैठे लोगों को पास लाने का काम किया। फिर ट्विटर ने विचारों को दुनिया के सामने रखने का मंच दिया। इंस्टाग्राम ने दिखावे की संस्कृति को जन्म दिया—यहाँ सिर्फ वही चीज़ें पोस्ट की जाती हैं, जो परफेक्ट दिखें। और फिर आया Snapchat और TikTok, जिसने लोगों को फ़िल्टर और एडिटिंग के सहारे एक नकली दुनिया में जीने के लिए मजबूर कर दिया।
व्हाट्सएप पर ‘Seen’ के बाद जवाब न आए तो बैचेनी बढ़ने लगती है। ट्विटर पर कोई हमारे विचारों से असहमत हो, तो पूरा दिन खराब लगने लगता है। लिंक्डइन पर किसी कलीग का प्रमोशन देखकर अपनी ज़िंदगी छोटी लगने लगती है।
यह सब हमारे दिमाग के साथ खेल है। हर बार जब हमें कोई नया नोटिफिकेशन, नया लाइक, नया कमेंट मिलता है, तो ब्रेन में डोपामिन रिलीज़ होता है—वही केमिकल, जो नशे की लत में भी उत्पन्न होता है। यही वजह है कि हम बार-बार सोशल मीडिया पर लौटते हैं, उम्मीद करते हैं कि हमें और ज्यादा लाइक्स और अटेंशन मिले।
पहले दोस्ती में दिल की बात मायने रखती थी, अब व्हाट्सएप स्टेटस। किसी ने हमारा स्टेटस नहीं देखा तो दोस्ती पर सवाल उठने लगते हैं। किसी ने हमारे पोस्ट पर लाइक नहीं किया तो मन में कटुता आने लगती है।
अंशुल की पत्नी पायल भी इस मायाजाल का हिस्सा थी। उसे फ़ोटोज़ खिंचवाने का शौक था—सिर्फ एक-दो नहीं, बल्कि सैकड़ों क्लिक्स। हर परफेक्ट शॉट के लिए वह कई-कई बार पोज़ बदलती, चेहरे के एंगल को ठीक करती, लाइटिंग चेक करती। लेकिन हाल ही में उसने एक नया तरीका खोज लिया था—Snapchat फ़िल्टर कैमरा।
"देखो, कितनी नैचुरल लग रही हूँ!" पायल ने एक दिन अंशुल को फ़ोटो दिखाते हुए कहा।
अंशुल हंसा, "नैचुरल? ये तो फ़िल्टर है, जिससे तुम्हारा चेहरा दस साल छोटा लग रहा है!"
पायल ने हंसते हुए कहा, "तो क्या हुआ? असली और वर्चुअल में अब फर्क ही कितना रह गया है?"
यह मज़ाक था, लेकिन अंशुल को इसमें छिपी सच्चाई दिखने लगी थी। हम सब असली से ज्यादा डिजिटल छवि को तराशने में लगे थे। ट्रैवल सिर्फ परफेक्ट फोटो के लिए, डिनर सिर्फ इंस्टाग्राम स्टोरी के लिए, दोस्ती सिर्फ स्टेटस अपडेट के लिए।
पर इसका असर सिर्फ व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहा, समाज और परिवार भी इसकी चपेट में आ गए हैं।
पहले परिवारों में साथ बैठकर बातें होती थीं, अब हर कोई अपनी स्क्रीन में खोया रहता है। पहले बच्चे माता-पिता के साथ खेलते थे, अब ऑनलाइन गेमिंग दोस्तों के साथ जुड़े रहते हैं। पहले बुजुर्ग अपने अनुभव साझा करते थे, अब व्हाट्सएप पर फ़ॉरवर्ड मैसेज पढ़कर दिन गुजारते हैं।
इसका नतीजा? संवेदनशीलता कम हो रही है, इंसानियत पीछे छूट रही है।
अब कोई किसी के सुख-दुख में नहीं जाता, बस "Feeling sad" या "Congratulations" लिखकर स्टेटस पर कॉमेंट कर दिया जाता है। सामाजिक ताने-बाने में जो आत्मीयता थी, वह अब सिर्फ इमोजी और GIFs में सिमट गई है।
अंशुल को देर रात एहसास हुआ कि वह असल पलों को खो रहा है। उसके पास हजारों फॉलोअर्स थे, लेकिन जब उसे किसी से बात करने की ज़रूरत महसूस हुई, तो फोन की स्क्रीन पर कोई नाम नहीं सूझा।
उसने तय किया कि अगली बार जब वह दोस्तों से मिलेगा, तो फोन को जेब में ही रखेगा। शायद उसे फिर से जीना सीखना होगा—बिना यह सोचे कि उसे कितने लाइक्स मिलेंगे।
सोशल मीडिया हमें जोड़ने के लिए आया था, लेकिन अगर इसे सही तरीके से न अपनाया जाए, तो यह हमें तोड़ सकता है। असली खुशी लाइक्स और फॉलोअर्स में नहीं, बल्कि उन रिश्तों में है, जिन्हें हम बिना किसी स्क्रीन के देख सकें, महसूस कर सकें।
अब सवाल यह है—हम इस मायाजाल से बाहर कब निकलेंगे?
About the Author
Sanjay Shharma is an engineer and management graduate, a second-generation entrepreneur with over 35 years of experience. A creator of products, markets, teams, and institutions, he blends modern innovation with deep-rooted Indian cultural values. His strong connection to the earth and his commitment to community development shape his perspectives on business, technology, and society.He can be reached at sanjay@gepco.in.

Comments
Post a Comment