रूठी हुई ख़ामोशी से, बोलती हुई शिक़ायतें अच्छी होती हैं

रूठी हुई ख़ामोशी से, बोलती हुई शिक़ायतें अच्छी होती हैं

लेखक: संजय शर्मा 

सुबह के पाँच बजे थे। चारों ओर गहरी ख़ामोशी थी। कमरे की हल्की रोशनी में मैं अपनी डायरी के पन्ने पलट रहा था। हर पन्ना एक दास्तान कह रहा था—ख़ामोशी की, जो बरसों तक रिश्तों के बीच एक अदृश्य दीवार बनकर खड़ी रही। कुछ ऐसे रिश्ते, जो बस नाम के रह गए, कुछ ऐसे, जो कभी थे ही नहीं।

मेरा कुत्ता मेरे पास आकर बैठ गया, उसकी पूंछ धीरे-धीरे हिल रही थी। मैंने उसे हल्के से सहलाया, लेकिन मन कहीं और था। यह ख़ामोशी सिर्फ़ इस वक़्त की नहीं थी, यह उन अनकही बातों की थी, जो कभी कही जानी चाहिए थीं लेकिन रह गईं।

एक पिता, जिसने अपने ही बेटे को खो दिया

मेरा एक दोस्त है। उसकी पत्नी के पिता, जो अब बुजुर्ग हो चले हैं, अपनी ही बनाई दीवारों में अकेले क़ैद हैं। एक ज़माने में उन्होंने अपने बेटे को घर से निकाल दिया था। कारण? बस एक झगड़ा। बेटे की शादी तय हुई थी, अरेंज्ड मैरिज थी, फिर भी किसी बात पर बात इतनी बढ़ी कि ग़ुस्से में उन्होंने कह दिया— "निकाल जा इस घर से!"

बेटा चला गया। और फिर कभी लौटकर नहीं आया। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा, और पिता ने भी कभी आगे बढ़कर हाथ नहीं बढ़ाया।

अब 35 साल हो गए। पिता ज़िंदा हैं, बेटा भी। लेकिन उनके लिए एक-दूसरे का कोई वजूद नहीं। वे एक-दूसरे के लिए मर चुके हैं, बस सांसें चल रही हैं।

बचपन में वही बेटा उनके कंधे पर चढ़कर दुनिया देखा करता था। वही बेटा, जिसे गोद में खिलाकर, कहानियाँ सुनाकर सुलाया करते थे। वही बेटा, जिसे पहली बार साइकिल चलाना सिखाया था, उसके घुटने छिलते थे, तो गोद में उठाकर बहलाते थे। आज उसी बेटे की शक्ल तक देखे बिना ज़िंदगी बीत रही है।

अब उम्र ढल चुकी है। आँखें कमज़ोर हो गई हैं, लेकिन हृदय की कठोरता अभी भी वैसी ही है। घर का आंगन सुनसान है। न कोई पोता-पोती दौड़ता है, न कोई "दादू-दादू" कहकर लिपटता है। सुनसान घर, खाली दीवारें, एक कुरसी पर बैठा बूढ़ा आदमी, जिसका ग़ुस्सा अब पछतावे में बदल चुका है। लेकिन अब क्या फ़ायदा? अब वो बेटा शायद पिता के मरने के बाद भी न आए।

दोस्त की पत्नी: अपने ही भाई से अजनबी

उसकी पत्नी भी अपने भाई जैसी ही हो चली है। पिता से यही सीखा कि रिश्ते निभाने नहीं, तोड़ने के लिए होते हैं। इतने सालों में न कभी भाई को देखा, न बात की। भाई की ज़िंदगी कैसी है, उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

कभी-कभी सोचता हूँ, क्या उसे भी कभी अहसास होता होगा? जब राखी के त्योहार पर उसकी कलाई सूनी होती होगी, जब मायके में भाई के बिना अकेले बैठती होगी, तब क्या उसके भीतर कुछ टूटता होगा? या फिर यह ख़ामोशी उसे अब आदत बन चुकी है?

एक दोस्त, जो मेरे पिता की मौत पर नहीं आया

ज़िंदगी अजीब होती है। जो सबसे क़रीब होते हैं, कभी-कभी वही सबसे दूर हो जाते हैं। मेरा एक बचपन का दोस्त था। हमने साथ में स्कूल की शरारतें की थीं, कॉलेज की ठहाके भरी शामें गुज़ारी थीं। जब भी ज़रूरत होती, वह मुझसे पहले खड़ा रहता था।

लेकिन जब मेरे पिता का देहांत हुआ, वह नहीं आया। एक फ़ोन तक नहीं।

उस दिन अहसास हुआ, कि कभी-कभी इंसान सिर्फ़ अपनी सहूलियत तक ही दोस्ती निभाता है। शायद उसने सोचा होगा, "क्या फ़र्क़ पड़ता है?" लेकिन मुझे फ़र्क़ पड़ा। बहुत पड़ा।

कभी-कभी रिश्ते ख़ामोश रहते-रहते मर जाते हैं। लेकिन जब उनकी मौत का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

पति-पत्नी: एक खामोश दीवार

रिश्ते हमेशा ऊँची आवाज़ में नहीं टूटते, कई बार वे ख़ामोशी से दरकते हैं। मैं और मेरी पत्नी भी कभी ऐसे ही दौर से गुज़रे थे। बातें कम हो गई थीं, शिकवे ज़्यादा। हम दोनों को लगता था कि हम सही हैं, और दूसरा ग़लत।

धीरे-धीरे एक चुप्पी हमारे बीच पसर गई। न कोई लड़ाई, न मनुहार। बस दो लोग, एक ही छत के नीचे, लेकिन दो अलग-अलग ज़िंदगियों में।

फिर एक दिन मैंने देखा—रात के अंधेरे में वह चुपचाप बैठी थी। आँखों में नमी थी, लेकिन लफ़्ज़ नहीं थे। शायद उसे भी इस ख़ामोशी से घुटन हो रही थी। शायद मुझे भी।

फिर यूँ ही एक दिन, महीनों बाद, मैंने पूछा— "चाय पियोगी?"

बस, यही एक वाक्य था, जिसने वह बर्फ़ पिघला दी, जो हमने महीनों से जमा कर रखी थी।

आख़िरी अहसास

पर जो दूसरों के साथ हुआ, वह मैं अपने साथ नहीं होने देना चाहता था।

एक बार ग़ुस्से में मैंने भी अपने बेटे से बहुत कुछ कह दिया था। यहाँ तक कि "अगर तुझे लगता है कि मैं ग़लत हूँ, तो अपना अलग घर ले ले!"

वह चुप रहा, लेकिन कमरे में जो ख़ामोशी आई, उसने मुझे बेचैन कर दिया। मैंने देखा, मेरी पत्नी की आँखें भी डरी हुई थीं।

उस रात नींद नहीं आई। क्या मैं भी वही कर रहा हूँ, जो मेरे दोस्त के पिता ने किया था?

सुबह होते ही मैंने बेटे को फ़ोन किया। वह ऑफ़िस में था। मैंने बस इतना पूछा— "बेटा, नाश्ता कर लिया?"

उसने हल्की हँसी में कहा— "हाँ पापा, कर लिया।"

बस, ख़ामोशी टूट गई।

ख़ामोशी की क़ीमत

रिश्ते कोई दस्तावेज़ नहीं होते, जिन पर एक बार लिख दिया तो मिटाया नहीं जा सकता। यह कोई व्यापार नहीं, जहाँ बराबर का हिसाब रखा जाए। यह वह धागा होते हैं, जो अगर टूट जाए, तो जोड़ने पर भी गिरह रह जाती है।

क्या खोया इन रिश्तों ने?

एक बेटा, जो अब पिता के बुज़ुर्ग होने पर भी लौटकर नहीं आएगा।

एक बहन, जिसके लिए उसका भाई अब सिर्फ़ एक नाम बनकर रह गया है।

एक दोस्त, जो कभी सबसे क़रीबी था, अब बस यादों में बचा है।

एक पति-पत्नी, जिन्होंने महीनों एक-दूसरे को देखा, लेकिन एक-दूसरे के बिना जिए।

"रिश्ते शब्दों से बनते हैं, ख़ामोशी से नहीं।"

हम सोचते हैं, कि समय रहते माफ़ी माँग लेंगे, बात कर लेंगे, लेकिन कई बार समय ही नहीं बचता। कई बार अहंकार इतना बड़ा हो जाता है कि रिश्तों की बुनियाद हिला देता है।

"गर्व विनाशाय"—अर्थात, अहंकार नाश का द्वार है। यह बात हमारे शास्त्रों ने भी कही, पर इसे समझते-समझते कई ज़िंदगियाँ ख़त्म हो गईं।

सुबह की हल्की रोशनी अब पूरे कमरे में फैल चुकी थी। घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, और मेरे कुत्ते को शायद एहसास हो गया था

कि अब मेरे उठने का वक़्त हो गया है। वह अपनी पूंछ हिलाते हुए मेरे पैरों से लिपट गया, जैसे कह रहा हो— "अब बहुत सोच लिया, चलो, दिन शुरू करते हैं!"

अब भी देर नहीं हुई। जिस भी रिश्ते में ख़ामोशी आ गई है, आज ही पहला क़दम बढ़ाइए।

क्योंकि रूठी हुई ख़ामोशी से, बोलती हुई शिकायतेँ अच्छी होती हैं।


About the Author:

A reflective storyteller rooted in the vibrant tapestry of India, Sanjay Shharma finds beauty in the everyday and seeks to inspire others to embrace life’s simple joys over the endless pursuit of more. Through personal anecdotes and cultural insights, Sanjay Shharma challenges us to live fully—with less hesitation and more heart.

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