"ज़िंदगी का असली बैलेंस"

"ज़िंदगी का असली बैलेंस"

लेखक: संजय शर्मा 

आज बाबूजी को गए एक साल हो गया। सुबह से ही मन भारी है। कुछ अजीब सा खालीपन है, जैसे घर का कोई कोना, जो हमेशा भरा रहता था, अब सूना हो गया हो। एक साल पहले भी ऐसा ही दिन था, लेकिन तब सब भागदौड़ में था—संवेदनाएं, जिम्मेदारियां, सब एक साथ। लेकिन अब जब शोर थम चुका है, तो अंदर कुछ बज रहा है... शायद वही ख़ामोशी जो बाबूजी अपने जाने से छोड़ गए।

कहते थे, "मन को बड़ा रखो, तो दुःख छोटे लगेंगे।" लेकिन मन कितना भी बड़ा कर लो, पिता के जाने से जो शून्य बनता है, वो भरता नहीं। वो बस फैलता जाता है, धीरे-धीरे पूरे व्यक्तित्व में घुल जाता है। मैं जब कभी खुद को आईने में देखता हूँ, तो बाबूजी की छवि झलकने लगती है। उनके जैसे विचार, उनकी तरह ठहराव, वही आदतें, वही नज़रिया। कभी-कभी लगता है, जैसे मैं अब उनके अधूरे शब्द पूरा कर रहा हूँ, उन्हीं की अधूरी चिट्ठियाँ लिख रहा हूँ।

बाबूजी को गए अभी एक साल ही हुआ है, लेकिन मैं खुद को सालों पुराना महसूस करता हूँ। एकदम शांत, ठहरा हुआ। पहले तेज़ी थी, भागदौड़ थी, लेकिन अब नहीं। अब वही करता हूँ जो करना चाहता हूँ। बैंक बैलेंस उतना बड़ा नहीं है, लेकिन मेरे पास हर चीज़ के लिए वक्त है। जैसे बाबूजी के पास था।

सुबह कमरे की बड़ी खिड़की से बाहर देखा—हरी-भरी घास, केले के गुच्छे, बेल की फैली लतरें। हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन मन में कहीं गहरी गर्माहट थी, जैसे बाबूजी अब भी कहीं यहीं हैं, मुझमें। माली खरपतवार निकाल रहा था, और मैं अपने अंदर से बची-खुची उलझनों को। पास ही पत्नी बैठी थी, अपनी डायरी में कुछ हिसाब-किताब लिखती हुई। वही रोज़ का सिलसिला। सोमवार है, उसका व्रत है, और इको डॉट पर सुबह से भजन चल रहे हैं।

कल ही देहरादून से लौटा हूँ, छोटे बेटे से मिलकर। 16 साल का मासूम लड़का, जो अभी तक हमारी छत्रछाया में था, अब एक नए माहौल में, नए संघर्षों के बीच है। उससे मिलकर आया तो मन में एक अजीब बेचैनी थी। वो कितना सीधा-सादा, भोला-भाला है! उसकी आँखों में अब भी वही मासूमियत है, वही दुनिया को सच्चा मानने वाली चमक। लेकिन मुझे पता है कि हॉस्टल की दुनिया अलग होती है, वहाँ हर कोई उतना निष्पाप नहीं होता। जब मैंने पत्नी को यह सब बताया, तो पहली बार देखा कि उसकी आँखों से दो बूँद आँसू ढलक पड़े। वो हमेशा से मजबूत रही है, अपने बच्चों के लिए ढाल बनी रही है, लेकिन इस बार वो बिखर गई। "पता नहीं, कैसे रहेगा वहाँ? वो तो इतना मासूम है... किसी ने कुछ कह दिया तो? कोई मज़ाक उड़ाए तो?" उसकी आवाज़ काँप रही थी। मैंने उसके हाथ को हल्के से दबाया, "हमने उसे अच्छे संस्कार दिए हैं, वो संभल जाएगा।" लेकिन माँ का दिल कहाँ इतनी आसानी से मानता है?

बड़ा बेटा अब बड़ा हो गया है। उसने अपना घर बना लिया है, अपनी दुनिया संवार ली है। उसकी हर चीज़ में एक परफेक्शन है, एक refinement है—शिक्षा से लेकर आदतों तक, उठने-बैठने के ढंग से लेकर बोलने के सलीके तक। कभी-कभी उसे देखकर लगता है, जैसे मेरी ही छवि का एक परिष्कृत संस्करण हो। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि उसके दिल में अब भी वही श्रद्धा, वही सम्मान बचा हुआ है। जब भी मिलता है, आँखों में वही अपनापन होता है, वही चिंता कि 'पापा ठीक से खा रहे हैं या नहीं? आराम कर रहे हैं या नहीं?' उसे मेरी आदतें पता हैं, मेरी पसंद-नापसंद पता है, और वो बिना कहे हर चीज़ का ख्याल रखता है।

शायद यही वो जीवन है, जिसकी तरफ मैं बढ़ रहा हूँ। सालों की मेहनत के बाद बिज़नेस को इस मुकाम तक पहुँचाया कि अब वो खुद चल सके। भागमभाग से निकलकर अब मैंने जीना सीखा है। पत्नी भी धीरे-धीरे मेरी तरह ठहराव को अपनाने लगी है। जो कभी शेयर मार्केट के ग्राफ़ में डूबी रहती थी, हर समय पैसे और इन्वेस्टमेंट की योजनाएँ बनाती थी, वो अब सुकून के पलों को समझने लगी है। हाँ, अब भी उसकी नज़र नए स्टॉक्स पर रहती है, लेकिन पहले जैसी हड़बड़ाहट नहीं रही। अब वो मेरे साथ बैठकर चाय पीने के लिए समय निकालती है, अब वो बेवजह शाम के सूरज को निहारती है, अब वो जल्दी में नहीं रहती। मुझे कभी-कभी मज़ाक में 'हुकुम' कहकर बुलाती है, जैसे उसने खुद को मेरी दुनिया में पूरी तरह समर्पित कर दिया हो।

लोग अक्सर पूछते हैं—"कितना कमा लिया?" लेकिन शायद सही सवाल यह होना चाहिए—"कितना जी लिया?" स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग को बैंक बैलेंस से मापा जा सकता है, लेकिन क्वालिटी ऑफ लाइफ... वो तो बस हमारी पसंद से तय होती है। मेरे पास महंगी गाड़ियाँ नहीं, कोई आलीशान फार्महाउस नहीं, लेकिन मेरा घर एक सजीव हरे-भरे ठिकाने जैसा है—बड़ी खिड़कियाँ, खुली हवा, शांत माहौल, और सबसे ज़रूरी, भरपूर समय।

बाबूजी ने जीवनभर यही सिखाया—सादगी में ही असली समृद्धि है। अब समझ आ रहा है कि वो क्यों अपनी साइकिल से भी उतने ही खुश रहते थे, जितना कोई बड़ी गाड़ी में बैठने वाला। उनका कहना था, "ज़िंदगी की रफ्तार से ज्यादा ज़रूरी यह देखना है कि हम किस ओर जा रहे हैं।" मैंने भी अब वही रास्ता चुन लिया है—भागने का नहीं, जीने का। शायद यही मेरे पिता को मेरी सच्ची श्रद्धांजलि है।

"बाबूजी, शायद मैं भी अब आपकी ही तरह जीने लगा हूँ—सुकून से, संपूर्णता में।"


About the Author


Sanjay Shharma is an engineer, management graduate, and second-generation entrepreneur with over 35 years of experience in building products, markets, teams, and institutions. Deeply rooted in Indian culture and a firm believer in the power of self-awareness, he integrates ancient wisdom with modern challenges. Passionate about community development, conscious living, and personal well-being, he shares insights drawn from life experiences, encouraging readers to live with more ease, joy, and fulfillment.

Comments

  1. बाबूजी एक महान युगपुरुष थे जिन के पद चिह्न वक्त की रेत पर पत्थर पर लिखी आयात की तरह अमिट है। उनका भौतिक शरीर हमारे साथ नहीं है लेकिन उनके साहित्य ओर समाज सेवा की महक हमेशा हर सकारात्मक सोच को राह दिखा ते रहेंगे। बाबूजी हमारी जीवन शक्ति ओर प्रेरणा है।

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