पैसा ओ पैसा
पैसा ओ पैसा
लेखक : संजय शर्मा
मैं भी देख रहा हूँ — लेकिन कुछ और।
आजकल, जब दुनिया अपनी तेज़ रफ्तार में डूब चुकी है, सेंसेक्स गिर रहा है, निफ़्टी लुढ़क रही है, और लोग केवल शेयर मार्केट, क्रिप्टो, रियल एस्टेट, तथा IPL की चमक-दमक में उलझे हुए हैं।
सुबह-सुबह, जब ग्रुप चैट्स में गर्म चर्चाएँ होती हैं और रात को हर ओवर पर एक्सपर्ट कमेंटरी गूँजती है, तो ऐसा लगता है कि हम एक ही धारा में बह रहे हैं।
"आज सेंसेक्स 1500 पॉइंट गिरा, पूरा मार्केट लुढ़क गया!"
"भाई, ये स्टॉक पकड़ लो, अगले हफ़्ते रॉकेट बनेगा!"
"कल के मैच में विराट के रन आएंगे या नहीं?"
हर कोई किसी न किसी ‘गति’ में है—अचानक रॉकेट बनने की उम्मीद, चौकों-छक्कों की झूठी उत्तेजना, और अब तो क्रिप्टो व रियल एस्टेट के वादे भी, जिनमें एक क्लिक में करोड़ों कमाने की बात की जाती है।
पर मैं भी देख रहा हूँ — लेकिन कुछ और।
सुबह के चार बजे, जब पूरी दुनिया नींद में डूबी होती है, मैं अक्सर जाग जाता हूँ। कमरे में सन्नाटा, दीवारों पर धुंधली छाया, और खिड़की से झांकती हल्की रोशनी में वो अनकहा सुकून मेरे अंदर उतर जाता है। बस एक आवाज़ सुनाई देती है—मेरे कुत्ते के पूँछ हिलाने की। उसे फ़र्क नहीं पड़ता कि सुबह के चार हैं या दोपहर के बारह, बस मैं दिखूं, तो उसकी मासूम ख़ुशी उभर आती है।
बाहर, सड़कें ठहरी हुई, हवा सुस्त, और मौसम की ठंडी महक में एक अजीब सुकून बिखर जाता है।ऐसे सेटिंग में मैं सोचता हूँ—ये ठहराव, ये ब्रेक्स, ज़िंदगी में कितने मायने रखते हैं।
लेकिन अब ये ठहराव लोगों को डराने लगा है।
पैसा कमाने का पागलपन इतना बढ़ चुका है कि हर कोई किसी न किसी ‘शॉर्टकट’ की तलाश में है। पहले लोग मेहनत, अनुभव, और धैर्य से कमाते थे—अब सबकुछ इंस्टेंट चाहिए।सोशल मीडिया पर हर दूसरा ‘फिनफ्लुएंसर’ स्टॉक्स, क्रिप्टो, और पैसिव इनकम के वादों में उलझा हुआ है, जबकि 100 में से 95 लोग अपना पैसा डुबो रहे हैं।
और हमने, पैसे कमाने के चक्कर में, अपनी ज़िंदगी को ‘यूज़फुल’ समझकर बाँट दिया है—
दोस्तों को तभी कॉल करते हैं जब काम हो, माँ-बाप से बात सिर्फ़ दवाई या अस्पताल के लिए, और जिन रिश्तों को हमने मैसेज में मैनेज करना शुरू कर दिया, वे धीरे-धीरे नोटिफिकेशन की तरह गायब हो जाते हैं।
फिर भी, हर रोज़, जब भी किसी से मिलते हैं या फोन पर ‘हैलो’ होती है— वही सवाल सामने आता है — "और क्या नया कर रहे हो?"
ये प्रश्न अब हमारी मानसिकता या सफलता का एक मानदंड बन चुका है। हम हर नया प्रोजेक्ट, हर नई इन्वेस्टमेंट, हर नए प्लान को इस उम्मीद में बाँध लेते हैं कि जितना बड़ा जवाब, उतनी बड़ी सफलता , हमने अपनी ज़िंदगी को इस सवाल के जवाब में बाँध लिया है -
"बस बिज़नेस बढ़ा रहे हैं,"
"नई इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं,"
"कुछ बड़ा प्लान कर रहे हैं "
" एक और प्लाट लिया है "
" बस अभी अमरीका जाने की तैयारी कर रहे हैं "
कभी कोई नहीं कहता, "कुछ नहीं कर रहा, बस ज़िंदगी देख रहा हूँ।"
पर शायद यही करना चाहिए।
कुछ दिन पहले, मैंने अनिल अग्रवाल जी , दुनिया के बड़े धन्नासेठों में से एक , का वीडियो इंटरव्यू देखा। एक ऐसा आदमी, जिसने ज़ीरो से अरबों तक का सफ़र तय किया, जिसकी आँखों में गहरी नमी और थकावट की कहानी झलकती थी।
उन्होंने धीरे से कहा,
"बहुत पैसा ठीक नहीं है... कभी सोचा नहीं था, कि जिस दौड़ को जीतने के लिए पूरी ज़िन्दगी लगा दी, उसी दौड़ ने सब कुछ पीछे छोड़ दिया।
शाम को जब घर लौटता हूँ, तो दरवाज़ा खोलते ही एक अजीब सा सन्नाटा छा जाता है।
कोई आवाज़ नहीं, कोई इंतज़ार नहीं, कोई कहने वाला नहीं कि 'आज देर हो गई'।
इसलिए दो कुत्ते रख लिए हैं, स्वागत के लिए।
कम से कम वे दरवाज़े पर खड़े तो मिलते हैं, पूछते हैं, जैसे कह रहे हों—'तुम आए, अच्छा लगा।'
लेकिन जो असली अपने थे, जिनके लिए कमाने निकला था, वे शायद कहीं दूर हो गए हैं।"
उस वाक्य ने मेरे अंदर ऐसा ठहराव पैदा कर दिया कि मुझे खुद से सवाल उठने लगे—
क्या ये दौड़, ये अंधी भागमभाग हमें वास्तव में उस मंज़िल तक ले जाती है जहाँ हम जाना चाहते हैं? या जब तक हम वहाँ पहुँचते हैं, सब कुछ पीछे छूट जाता है?
हर रोज़, Sensex ऊपर-नीचे होता है, NIFTY के ग्राफ में ज़िंदगी की धड़कनें फंसी रहती हैं।करोड़ों की डील, शेयर जो आसमान छूते हैं—पर क्या यही सब कुछ है? मैंने समझा कि पैसा सब कुछ हो सकता है, पर सब कुछ नहीं।
हम दौड़ते हैं— बच्चों के लिए, परिवार के लिए, रिश्तेदारों के लिए। हम पैसे जुटाते हैं, उनके हर ख़्वाब पूरे करते हैं। वे बड़े होते हैं, और फिर एक दिन वे उड़ जाते हैं—अपने-अपने जीवन में, अपने संघर्षों में।
और हम?
हम वहीं रह जाते हैं— अपने उस सपने के साथ, जो अब उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। और फिर, एक और गहरा सवाल उठता है —
हमने सोचा, पैसा सबसे ज़रूरी है—हां, ज़रूरी है, लेकिन कब तक?
जब आप अपनी ज़िंदगी की आख़िरी सांसें गिन रहे होंगे, आपके बच्चे शायद बेचैन होकर बाहर बैठे होंगे -उस विरासत का इंतज़ार करते हुए , जिसे आपने पूरी ज़िंदगी जोड़ने में लगा दी। वह पैसा, जिसके लिए आपने रिश्तों की क़ुर्बानी दी, वही पैसा अब बँटने के लिए तैयार होगा।
शायद उनके चेहरों पर चिंता होगी, लेकिन वजह आपकी तकलीफ़ नहीं, बल्कि वसीयत होगी।
याद आएंगे वो दिन, जब आपने पेट काटकर खिलौने लाने का वादा किया था - अब जब आप अस्पताल में होंगे, तो शायद वो ही डॉक्टर से कह रहे होंगे, "लाइफ़ सपोर्ट पर रखना ज़रूरी है क्या?"
मैं समझ शायद गया, अब वक़्त आ गया है—रुकने का, जीने का, सिर्फ़ कमाने का नहीं।
क्यूंकि जब हमें सहारे की जरूरत होगी, तब ये स्टॉक्स, FD, और प्रॉपर्टी के पेपर- क्या हाथ पकड़कर हमारी मदद करेंगे?
हम शायद तब समझेंगे , पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
फिर सुबह, जब मैं 5 बजे उठता हूँ, मेरा वफ़ादार कुत्ता अपनी हल्की भनभनाहट में मेरी आहट सुनकर पूँछ हिलाता हुआ पास आता है। उस मुस्कुराहट में, उस अनमोल ख़ुशी में मुझे एहसास होता है कि- ज़िंदगी के छोटे ठहराव ही असली इन्वेस्टमेंट हैं।
मैं अपने आस-पास देखता हूँ—
सड़कें सुस्त, ठेले वाला चाय बना रहा है, दूधवाले अपनी ड्यूटी में जुटे हैं, और कुछ लोग पार्क में दौड़ते हुए नजर आते हैं। पर सबसे सच्ची तस्वीर मुझे तब मिलती है, जब एक बूढ़ा आदमी बेंच पर चुपचाप बैठा होता है— उसके चेहरे पर गहरी उदासी, हाथ में पुरानी फोटो, शायद किसी के इंतज़ार में, जो अब कभी न आए।
उस चेहरे ने मुझे अपना भविष्य दिखा दिया - क्या होगा, जब मैं भी ऐसे ही अकेला रह जाऊँगा?
अब मैं, सुबह के ठहराव में दुनिया को जागते हुए देखता हूँ, तो सोचता हूँ— हम किसके लिए भागते हैं? हर दिन हम फोन उठाकर देखते हैं—आज हमारा बैलेंस कितना बढ़ गया? ये सब किसलिए ? सवाल बहुत थे, पर जवाब पता नहीं!
पर क्या हमने कभी सोचा कि जब ये दौड़ ख़त्म होगी, तब कौन हमें थामेगा?
क्योंकि जब सब कुछ ख़त्म हो जाएगा—जब दिन ढलने लगेगा, जब शरीर जवाब देने लगेगा, जब दुनिया भूल जाएगी कि तुमने कितने करोड़ कमाए थे- तब सिर्फ़ एक इंसान बचेगा - हमारा जीवनसाथी।
वही, जिसे हमने हमेशा कहा—"अभी टाइम नहीं है।" बच्चे, दोस्त, रिश्तेदार—सब कुछ बदल जाता है, पर अंत में बस वही रहता है, जिसने हमेशा हमारे साथ रहने का वादा किया हो।
वो तब भी होगा, जब हमारी आँखों में नींद होगी, जब ज़िन्दगी थक जाएगी, जब हम अपने बाकी रिश्तों को भूल जाएंगे। वो तब भी हमारी दवाइयाँ लेकर आएगा, जब हम बिना बताए बीमार होंगे, और बिना पूछे, माथे पर हाथ रखकर कहेगा — "कैसा लग रहा है?"
सुबह का ठहराव मुझे यही समझाता है—कि प्यार, साथ, अपनापन, बिना शर्त के रिश्ता — यही असली संपत्ति है — हमारा अपने जीवनसाथी के साथ। और अगर इसे सँभालने का वक़्त आज नहीं निकाला, तो कल यह भी हाथ से चला जाएगा।
फिर मैं घर लौटा, और पहली बार इतने सालों बाद, मैंने फ़ोन में 'बैंक बैलेंस' नहीं, अपनी पत्नी की आँखों में देखा। समझा कि —सेंसेक्स गिरता रहेगा, निफ़्टी लुढ़कती रहेगी , तुम बस अपने जीवन का इंडेक्स संभालो।
क्या 'बड़ा' वही है जो दिखता है ? या फिर वो लम्हे भी बड़े हैं, जब हम बिना किसी योजना के बस यूँ ही अपने साथी के साथ टहलने निकल जाते हैं, जब घर के सोफे पर बैठकर किसी पुरानी याद पर हंस पड़ते हैं? शायद असली इन्वेस्टमेंट वही हैं — अपने जीवनसाथी के साथ समय। वो छोटी-छोटी बातें, जो हमारी ज़िंदगी की असली वैल्यू देतीं हैं।
तो अगली बार कोई पूछे,
"आजकल क्या नया कर रहे हो?" शायद यह कहने का वक्त आ गया है —
"बस ज़िंदगी देख रहा हूँ, और पूरी तरह जी रहा हूँ... उसके साथ।"
About the Author
Sanjay Shharma is an engineer, management graduate, and second-generation entrepreneur with over 35 years of experience in creating products, markets, teams, and institutions. Deeply rooted in Indian culture and the rhythms of life, his writing blends sharp psychological insight with evocative storytelling. With a keen eye for human desires, relationships, and existential dilemmas, he crafts narratives that seduce, challenge, and linger long after the last word. He believes that the most profound truths are often hidden in the illusions we chase.

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