भगवान के साथ इंटर्नशिप

भगवान के साथ इंटर्नशिप

लेखक: संजय शर्मा 


सुबह के चार बजे
सुबह के चार बजे थे, और मेरी नींद वैसे ही उड़ चुकी थी जैसे बिना अलार्म के रविवार की सुबह होती है। कल से ही मेरे सिर में हल्का-हल्का दर्द था—थकान का असर, एक अनजानी पीड़ा जो धीरे-धीरे मेरे अंदर बस गई थी। घर में मेरी पत्नी, सुरीन, अपने पूरे मिशन में लगी हुई थी—सर्दियों के कपड़ों को बड़े जतन से निकालकर बक्सों में जमा करना, ऊन की शॉल को तह करना, कभी मेरे पुराने स्वेटर को देखकर चुपके से कहना,
  “अब ये पहनोगे?”
मैंने बस गर्दन हिला दी, क्योंकि विरोध करने का मतलब था लंबी बहस।

मैंने बिना किसी आवाज़ के चुपचाप उठकर किचन में प्रवेश किया। इतनी सावधानी बरती कि कहीं उसकी नींद में खलल न पड़े—क्योंकि अगर जाग गई, तो तुरंत सुनने को मिल जाता,
  “अब तुम भी कुछ काम करो!”
मैंने अदरक कद्दूकस किया, चाय पत्ती डाली, और एक कप में गरम चाय भर ली। जैसे ही मैं कप लेने के लिए हाथ बढ़ाया, दरवाज़े के पास मेरा कुत्ता खड़ा हुआ, कान खड़े, पूंछ धीरे-धीरे हिल रही थी—उसकी आँखों में स्पष्ट संदेश था,
  “चलो, बाहर ले चलो मुझे!”

मैंने बिना रुकावट दरवाज़ा खोला। कुत्ता अपनी तयशुदा दिनचर्या में बाहर गया—फूलों की खुशबू ली, ठंडी ओस की बूंदों का आनंद लिया, फिर चुपचाप वापस आकर सीधा किचन में मुझे घूरने लगा, मानो कहता हो,
  “अब बिस्कुट कहाँ है?”
मैंने उसे बिस्कुट दे दिए और फिर चुपचाप बालकनी में बैठकर चाय पीता रहा। अंदर बेडरूम में सुरीन गहरी नींद में सोई हुई थी, कभी-कभी करवट बदलते हुए बड़बड़ाती,
  “बस सोने दो... ज़िंदगी में पहली बार चैन से सो रही हूँ।”

धड़ाम!
एक जोरदार झटके की आवाज़ ने सब कुछ पलट दिया—मेरे पैर फिसले, और मैं अंधेरे में खो गया। उस क्षण ऐसा लगा जैसे कोई अनजानी शक्ति मुझे धीरे-धीरे ऊपर खींच रही हो, और फिर सब कुछ काला हो गया।

जब मेरी आँखें फिर खुलीं, तो मैं खुद को एक अद्भुत, दूधिया-गोल्डन रोशनी से भरे हॉल में पाया। लेकिन वहाँ स्वर्ग के पारंपरिक स्वागत की जगह, एक ऑफिसनुमा वातावरण था। सामने एक बड़ा सा द्वार था जिस पर लिखा था—
  “ईश्वर प्रबंधन एवं मानव संसाधन विभाग”
अंदर प्रवेश करते ही नारद मुनि तुरंत आए, मुझे एक आईडी कार्ड देकर बोले,
  “बधाई हो! आपको स्वर्ग-नरक में सीधे एंट्री नहीं मिली, बल्कि भगवान के ऑफिस में इंटर्नशिप का मौका मिला है।

मैं चौंककर पूछा,
  “मेरे साथ ही क्यों?”
नारद मुनि मुस्कुराकर बोले,
  “तुम्हें सोचने की आदत है, सही-गलत पर विचार करते हो—इसीलिए तुम्हें चुना गया। वैसे भी, भगवान अब सीधे फैसले लेने के बजाय, कुछ समझदार दिमागों को पहले ट्रेनिंग देना चाहते हैं।”

फिर मुझे बड़े कार्यालय में ले जाया गया, जहाँ चारों ओर रजिस्टर, कंप्यूटर, और देवता टाइपिंग में बिज़ी थे। सामने एक बोर्ड पर लिखा था,
  "कृपया उचित अनुरोध करें। भगवान बहुत व्यस्त हैं!"
मैंने सोचा,
  “मुझे इंटर्नशिप क्यों दी?”
भगवान हँस पड़े,
  “तू ज़िंदगीभर ज्ञान बाँटता रहा, अब तुझे सीखना भी ज़रूरी है!”

भगवान ने मुझे अपनी टेबल के पास बुलाया , बड़े आराम से बैठे थे, लेकिन उनके माथे पर हल्की शिकन थी।
  "देख," उन्होंने कहा,
  “हर इंसान की फ़रमाइश अनोखी होती है, लेकिन लगभग सभी के पीछे स्वार्थ छुपा होता है। तेरा काम है यह समझना कि किसकी अर्जी सिर्फ़ सुविधा की माँग है और किसमें वाकई कर्म की भावना।”
  "पर यह सब तय करने का कोई नियम है?" मैंने जिज्ञासा से पूछा।
  उन्होंने मुस्कुराया,
  “है, लेकिन इंसानों की अकल की तरह बहुत पेचीदा।”

उन्होंने स्क्रीन पर कुछ अर्ज़ियाँ खोल दीं:
  - "भगवान, मेरी किस्मत बदल दो!"
  - "हे प्रभु, मेरी नयी कार कोई नज़र न लगे!"
  - "मुझे IPL फाइनल मैच का टिकट दिलवा दो!"
  - "अभिनेत्री को मेरे शोरूम का उद्घाटन करा दो!"
  - "मेरे बच्चे का दाखिला करा दो!"
  - "बेटे को सरकारी नौकरी दिलवा दो, मेरी इज़्ज़त का सवाल है!"
  - "वो पड़ोसी जो रोज़ नया फ़ोन खरीदता है, उसका धंधा चौपट कर दो!"

"अब तू बता," भगवान बोले,
  “इनमें से कौन-सी अर्ज़ियाँ पास करनी चाहिए?”
मैंने कुछ पल सोचा,
  "कोई भी नहीं। ये सब इंसान की अपनी कोशिशों से जुड़ी चीज़ें हैं, भगवान को इनमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए!”
उन्होंने ताली बजाई,
  "शाबाश! तुझमें अक्ल है!"

फिर उन्होंने एक और अर्ज़ी खोली—
  "भगवान, मेरी माँ बहुत बीमार है। डॉक्टर कह रहे हैं कि चमत्कार ही बचा सकता है। बस उसे ठीक कर दो!"
मैंने झिझकते हुए पूछा,
  "इसका क्या करना चाहिए?"
वे गंभीर हो गए,
  “यही असली चुनौती है। बीमारी कर्मफल है, लेकिन अगर प्यार और सेवा से कोई व्यक्ति किसी के लिए प्रार्थना कर रहा है, तो उसमें निस्वार्थ भावना होती है। हमें इसे नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए।”

फिर उन्होंने एक और अर्ज़ी दिखाई—
  "हे प्रभु, मुझे IAS बना दो, मेरे माता-पिता का सपना पूरा करना है!"
"क्या यह स्वार्थ है?" भगवान ने पूछा।
मैंने सोचा और कहा,
  “अगर माता-पिता का सपना पूरा करने की भावना से प्रेरित है, तो यह अच्छी बात हो सकती है, लेकिन बिना मेहनत किए सीधा आशीर्वाद माँगा जाए, तो यह स्वार्थ है।”
वे हँस पड़े,
  "तू काफ़ी तेज़ सीख रहा है।"

भगवान ने मुझे आगे सिखाया,
  “इंसान जब तक मेहनत करना सीखता नहीं, तब तक उसका भाग्य बदलना बेकार है। अगर हम बिना मेहनत के किसी को कुछ दे देंगे, तो उसकी आदत ही खराब होगी।”
"तो आप कुछ भी नहीं देते?" मैंने पूछा।
वे बोले,
  “हम बस सही मौकों को इंसानों की तरफ़ मोड़ देते हैं। अब यह उन पर है कि वे मेहनत करें और उसे पकड़ लें या नहीं।”

फिर उन्होंने एक और अर्ज़ी खोली—
  "भगवान, मेरी बीवी मुझसे रोज़ लड़ती है। उसे थोड़ा समझा दो!"
मैंने हँसते हुए कहा,
  “यह तो सीधा रिजेक्ट!”
लेकिन भगवान मुस्कुराए,
  “अरे, इतनी जल्दी रिजेक्ट मत कर। हो सकता है, इसमें कोई सुधार की गुंजाइश हो।”
उन्होंने अर्ज़ी के नीचे 'ऑटो-रिप्लाई' भेज दिया—
  "संवाद से सुलह संभव है। पहले अपनी बीवी से प्यार से बात कर।"
मैं हैरान था,
  "भगवान, आप लोगों को सलाह भी देते हैं?"
वे बोले,
  “कई बार इंसान को बस सही दिशा दिखाने की ज़रूरत होती है। सारा काम उसे ही करना पड़ता है!”

इस ट्रेनिंग के बाद भगवान ने मुझे रिपोर्ट कार्ड पकड़ा दिया।
  "इंटर्न अच्छा सीख रहा है, लेकिन अभी बहुत जल्दी डिसीजन लेता है। धैर्य की ज़रूरत है!"
मैंने मज़ाक में पूछा,
  "तो क्या मुझे स्वर्ग में रख लेंगे?"
वे बोले,
  "अभी नहीं। वहाँ की अर्ज़ियाँ और भी ज़्यादा अजीब होती हैं!"
फिर उन्होंने मेरी फाइनल परीक्षा रखी—
  "अगर तुझे सिर्फ़ एक इंसान की अर्ज़ी पास करने का मौका मिले, तो किसकी करेगा?"
मैंने कुछ सोचा और कहा,
  "जिसकी अर्ज़ी में निस्वार्थ प्रेम होगा।"
भगवान ने सिर हिलाया,
  "यही सही जवाब है।"

भगवान दबाव और घूसखोरी से परेशान बैठे थे 
  "हर कोई अपनी सुविधा चाहता है, बिना मेहनत किए। वरत, प्रसाद, सवामणी, 11 रुपये—बस इतनी सी रिश्वत देकर मुझसे सबकुछ करवाना चाहते हैं। 

अगर ये इतनी मेहनत खुद पर करें, तो खुद ही अपनी किस्मत बदल लें!"

इसी बीच, एक नया ट्रेंड भी उभर आया—इंस्टाग्राम भक्त!
एक फेमस सोशल मीडिया गुरूजी बोल रहा था,
  "मेरा भगवान से direct contact है, अब देखो, भगवान ke behalf पर  मैं सारी  request पूरी करता हूं!"

देवताओं की हालत भी बेहाल थी।
गणेशजी सिर पकड़कर बैठे थे—
  "लोग हर काम मुझसे शुरू कराते हैं, पर खुद मेहनत नहीं करना चाहते!"
कुबेरजी दु:खी थे
  "मुझसे धन मांगते हैं, पर खुद ही बर्बाद कर देते हैं!"
यमराज परेशान थे—
  "हर कोई अमर होना चाहता है, पर सेहत का ध्यान कोई नहीं रखता!"

भगवान ने मुझे ह्यूमन बिहेवियर एनालिसिस का काम सौंपा। 

मैंने देखा कि 90% अर्ज़ियाँ खुद के फायदे की थीं, जबकि बाकी 10% में लोग अपनी छवि सुधारने की फिक्र में लगे थे।
  कुछ लोग जागरण में रात भर मंत्र जपते हैं, ताकि सोशल मीडिया पर 'सच्चे भक्त' के रूप में दिखें।
  कुछ घर में पाठ करवाते हैं, ताकि रिश्तेदार और पड़ोसियों को यह लगे कि वे कितने धार्मिक हैं।
  कुछ कुम्भ में स्नान करते हैं, सिर्फ इस उम्मीद में कि उनकी तस्वीरें वायरल हो जाएँ।
  कुछ हवन करते हैं, केवल अपनी छवि चमकाने के लिए।

यहाँ भगवान ने मुझे सिखाया कि कैसे फैसले लेने हैं, कैसे हर प्रार्थना में छुपा स्वार्थ और कर्म की भावना को समझना है। उन्होंने बताया,
  इंसान अपने कर्मों से ही अपनी तकदीर बनाता है, माँगने से कुछ नहीं मिलता।”

ये सीख मुझे हमेशा याद रहेगी।

इसी बीच स्क्रीन पर एक  notification आया , मेरी पत्नी सुरीन की प्रार्थना —
  "हे भगवान, मेरे 'हुकुम' को वापस भेज दो, मेरी ज़िंदगी मुझसे सूनी हो गई है! शायद कुछ घंटों में समझ आ गया, जो 33 साल में नहीं समझी।"
भगवान मुस्कुराए,
  "इतनी जल्दी किसी पत्नी की इतनी heartfelt request नहीं आई! अब तुम्हारी इंटर्नशिप पूरी हुई।"

भगवान ने फिर मुझे एक रिपोर्ट दी—
  "इंटर्न अच्छा काम कर रहा है, लेकिन उसे अभी और समय चाहिए।"
मैंने हड़बड़ाकर पूछा,
  "तो क्या अब यहीं रख लोगे?"
वे बोले,
  "नहीं रे, वापसी का भी सिस्टम है। वैसे भी, वहाँ लोग तेरा इंतज़ार कर रहे हैं।"
फिर अचानक एक ज़ोरदार झटका लगा, और मेरी आँखें खुलीं।

मैंने चारों तरफ़ देखा—अस्पताल का कमरा, मॉनिटर की बीप-बीप, और सामने मेरा डॉक्टर दोस्त, जो मेरे बहुत करीबी हैं, माथे पर पसीना, आँखों में गहरी चिंता के साथ बोले,
  "साले, वापस ले आया हूँ! अब ठीक हो जा, जल्दी से संभल!"
मैं दर्द के बीच धीरे-धीरे होश में आया।

मेरे घर लौटते ही, माँ मंदिर से आयी , जहाँ उन्होंने मेरी  लिए पूरी श्रद्धा से प्रार्थना की थी, हाथ में गरमा-गरम बूंदी का प्रसाद लेकर।

सुरीन ने तुरंत कटोरी में भुजिया मिलाकर मेरे पास आकर बैठ गई। अब उसकी आँखों में सिर्फ़ चिंता ही नहीं, बल्कि गहरी ममता और देखभाल झलक रही थी।
धीरे से पूछते हुए उसने कहा,
  "क्या महसूस हुआ इन 6 घंटों में?"

मैंने गहरी साँस ली, अपनी आँखों में उस दिव्य अनुभव की झलक संजोते हुए कहा,
  “भगवान ने मुझे यही सिखाया कि इंसान को अपनी ज़िंदगी में बस माँगने से कुछ नहीं मिलता।

 असली बदलाव तो तब आता है जब हम अपने कर्मों पर ध्यान देते हैं। 

देखो, स्वर्ग के ऑफिस में हर एक प्रार्थना, हर एक शिकायत हमारे अंदर की बेवकूफी का आईना है।

 लोग बिना मेहनत किए, सिर्फ रिश्वत, वरत, प्रसाद, सवामणी, और 101 रुपये देकर मुझे प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। 

पर असली दुआ तो वही है जो बिना माँगे अपने आप मिल जाती है।”

मैंने फिर कहा,
  “ज़िंदगी भी बूंदी-भुजिया जैसी है—थोड़ी मीठी, थोड़ी तीखी। अगर सही अनुपात में मिल जाए, तो उसका स्वाद अद्भुत हो जाता है।

 इंसान को अपनी बेवकूफी छोड़, अपने कर्मों में सुधार करना होगा। 

यही भगवान का संदेश है—जो सच में देना होता है, वो बिना माँगे ही दे दिया जाता है।”

सुरीन की आँखों में आंसू थे, लेकिन उसकी मुस्कान में गहरी संवेदना और देखभाल झलक रही थी,
  "33 साल में इतना नहीं सीखा जितना इन छह: घंटों ने सिखा दिया ।"
मेरे कुत्ते ने पूँछ हिलाते हुए पास आकर, मानो पूछता हो,

  "अब मुझे भी समझाओ, भाई!"

और मैं सोचने लगा—
  "ज़िंदगी में असली मसाला तो हमारी समझ में बदलाव में छिपा है। इंसान अपनी बेवकूफी छोड़, अपने कर्मों में सुधार कर ही आगे बढ़ सकता है।"

आज से, मैं सिर्फ़ चाय नहीं, बल्कि अपनी सोच में भी बदलाव लाने का प्रण लेता हूँ—क्योंकि असली दुआ और असली सफलता अपने अंदर ही छिपी है।

About the Author

Sanjay Shharma is an engineer, management graduate, and second-generation entrepreneur with over 35 years of experience in building products, markets, teams, and institutions. 

This narrative is the creative work of a storyteller who blends humor, Indian mythology, and philosophical insights to explore the complexities of human nature. Passionate about social commentary and introspection, the author uses vivid imagery and playful satire to remind us that true fulfillment comes not from demanding shortcuts, but from self-improvement and sincere effort.

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