जिंदगी का फोन : रीसेट

ज़िंदगी का फोन: रीसेट और रिइंस्टॉल

लेखक: संजय शर्मा

शाम का वक्त।

ड्राइंग रूम की हल्की रोशनी में मेरा बेटा बैठा है—तीस साल का, स्मार्ट, तेज़, लेकिन आज कुछ थका हुआ सा। हाथ में फोन, उंगलियाँ स्क्रीन पर स्क्रॉल करती जा रही हैं। उसके चेहरे पर एक अजीब सा खालीपन है।

मैं चुपचाप पास जाकर बैठा।

“क्या हुआ?”

उसने गहरी सांस ली, “बस पापा… कुछ समझ नहीं आता। सब कुछ है, फिर भी कुछ अधूरा सा लगता है। दिमाग हर वक़्त भरा-भरा सा रहता है, लेकिन दिल... खाली।”

मैं मुस्कुराया, “फोन दिखा ज़रा।”

वह थोड़ा चौंका, “क्यों?”

“बस दिखा।”

उसने अनमने ढंग से अपना फोन बढ़ा दिया। मैंने स्क्रीन देखी—हर ऐप ओपन था, बैकग्राउंड में दर्जनों टैब, नोटिफिकेशन की बाढ़, बैटरी लो। फोन गरम हो रहा था, जैसे बस अभी क्रैश होने वाला हो।

मैंने स्क्रीन उसकी तरफ बढ़ाई, “देख, तेरा फोन वैसे ही थक गया है, जैसे तू।”

वह हल्के से मुस्कुराया, “पापा, फोन और मैं कैसे एक जैसे हो सकते हैं?”

मैंने सिर हिलाया, “एकदम वैसे ही। जब नया फोन आता है, कितना स्मूद चलता है? कुछ ही ज़रूरी ऐप्स होते हैं, बैटरी टिकती है, स्पीड फास्ट। फिर धीरे-धीरे हम फालतू के ऐप इंस्टॉल कर लेते हैं—कुछ ज़रूरत के, कुछ दिखावे के, कुछ सिर्फ इसलिए कि दूसरों के पास हैं। फिर नोटिफिकेशन की बाढ़ आ जाती है, हर ऐप हमें अपनी तरफ खींचता है, और धीरे-धीरे फोन स्लो हो जाता है, हैंग करने लगता है।”

वह ध्यान से सुन रहा था।

“ज़िंदगी भी ऐसी ही होती है। बचपन में सब सिंपल होता है—खेलना, सीखना, खुश रहना। फिर समाज हमें कई ‘ऐप्स’ इंस्टॉल करने को कहता है—कामयाबी, स्टेटस, परफेक्शन, comparison, सोशल मीडिया की validation, और दूसरों को खुश करने की कोशिश। धीरे-धीरे ये सब बैकग्राउंड में चलते रहते हैं, और हम हैंग होने लगते हैं।”

उसने सिर झुका लिया, “तो फिर सॉल्यूशन क्या है?”

मैंने उसका फोन वापस उसकी तरफ बढ़ाया, “रीसेट कर।”

वह हँस पड़ा, “मतलब?”

“जो भी ज़रूरी नहीं, उसे हटा दे। कुछ ऐप्स डिलीट कर, कुछ की नोटिफिकेशन बंद कर, और कुछ को सिर्फ तब खोल जब वाकई ज़रूरत हो। वैसे ही ज़िंदगी में भी कर—comparison हटा, validation के पीछे भागना बंद कर, और सिर्फ वही रख जो असल में खुशियाँ देता है।”

"और सिर्फ डिलीट करने से कुछ नहीं होगा, बेटा। तुझे कुछ ज़रूरी ऐप्स इंस्टॉल भी करने होंगे, जो ज़िंदगी को आसान और खुशहाल बनाएँ।"

उसने उत्सुकता से मेरी तरफ देखा, "कौन से ऐप्स?"

मैंने मुस्कुराकर कहा, "चल, तुझे कुछ मस्ट-हैव लाइफ ऐप्स इंस्टॉल करवा देता हूँ।"

Gratitude App—हर दिन कुछ अच्छा देखने और महसूस करने की आदत डालने का ऐप।

"बेटा, तुझे पता है, दिनभर की भागदौड़ में हम जो कुछ अच्छा होता है, उसे भूल जाते हैं। ये 'Gratitude App' इंस्टॉल कर ले—हर रात सोने से पहले तीन चीजें लिख जो तुझे खुशी दी। चाहे वो एक अच्छी चाय हो, किसी का मुस्कुराकर हाल पूछना, या बस आराम से बैठकर साँस लेना। ये ऐप तुझे छोटी चीजों में बड़ी खुशियाँ दिखाएगा।”

Compassion App—अपने लिए और दूसरों के लिए सॉफ्टनेस लाने का ऐप।

"ये तेरा एंटी-वायरस है। दुनिया में हर कोई अपनी लड़ाई लड़ रहा है, किसी पर गुस्सा करने से पहले, उसे समझने की कोशिश कर। ये ऐप इंस्टॉल कर ले, ताकि तुझे दुनिया थोड़ी कम कड़वी और थोड़ी ज्यादा अपनापन भरी लगे।"

Detox App—स्क्रीन टाइम कम करने का ऐप, असली जिंदगी से जुड़ने का ऐप।

"दिन में एक घंटा फोन से दूर रहने का अलार्म लगा। जब ये बजे, तब फोन नहीं छूना। ये छोटा सा ब्रेक तेरा माइंड रिफ्रेश कर देगा।"

Power Bank —खुद को चार्ज करने वाले लोगों और चीजों से जुड़ने का यंत्र।

"बेटा, तुझे भी एक पावर बैंक चाहिए। वो लोग, वो रिश्ते जो तुझे एनर्जी देते हैं—माँ-पापा, दोस्त, तेरा खुद का समय, कोई हॉबी—इनसे तू खुद को चार्ज कर। बिना चार्ज किए तू कितनी देर टिकेगा?"

WiFi—सही लोगों और सही विचारों से जुड़ने का सिग्नल

"हर जगह कनेक्ट होने की जरूरत नहीं, गलत नेटवर्क से जुड़ा तो वायरस घुसेगा। सही लोगों से कनेक्ट रह, जो तुझे ऊपर उठाएँ, नीचे नहीं गिराएँ।”


Bluetooth Off —हर किसी को अपनी जिंदगी में घुसने न देने का फिल्टर ।

"हर कोई तेरे फोन से जुड़ने के लायक नहीं होता। कुछ लोग सिर्फ डेटा चुराते हैं, एनर्जी खत्म करते हैं। Selective Bluetooth On रख, वरना तू बहुत जल्दी drain हो जाएगा।”

उसने फोन स्क्रीन को देखा। कुछ देर बाद उसने कुछ बेकार के ऐप्स हटाने शुरू कर दिए। फिर अचानक मुस्कुराया, “पापा, ये तो सही में काम कर रहा है!”

मैंने उसकी पीठ थपथपाई, “बिलकुल। अब असली सवाल—क्या लाइफ में भी रीसेट कर पाएगा?”

वह चुप रहा। शायद सोच रहा था कि कौन-कौन से “ऐप्स” उसे अब भी ज़रूरत से ज़्यादा चला रहे थे।

तभी मैंने एक पुरानी डायरी निकाली। बाबूजी की डायरी।

मैंने उसे खोला और एक पन्ना पढ़ा,

"आज कोई बड़ी चीज़ हासिल नहीं की। बस शाम को बेटे के साथ बैठकर चाय पी। और कुछ नहीं चाहिए था।"

मैंने डायरी उसकी ओर बढ़ा दी।

“शायद तुझे भी किसी दिन ऐसा लगे कि असली चीज़ें बहुत कम और बहुत सस्ती होती हैं। बस, हमें उन्हें रीइंस्टॉल करना आना चाहिए।”

वह चुपचाप डायरी पढ़ता रहा।

पहली बार, मैंने उसे अपना फोन टेबल पर रखते देखा।

शायद पहली बार, वह सच में प्रेज़ेंट था—बिना किसी नोटिफिकेशन के, बिना किसी डिस्ट्रैक्शन के।

मैंने हल्के से कहा,

“बेटा, फोन में एक ऑप्शन होता है—फैक्ट्री रीसेट। एक बटन दबाते ही सारी फालतू चीज़ें मिट जाती हैं, बस वही बचता है जो असली होता है।

अगर ज़िंदगी का ऐसा कोई बटन होता… तू उसे दबाने की हिम्मत रखता?”

उसने मेरी तरफ देखा। इस बार उसकी मुस्कान अलग थी।

About the Author

Sanjay Shharma is an engineer, management graduate, and second-generation entrepreneur with over 35 years of experience in building products, markets, teams, and institutions. 

This narrative is the creative work of a storyteller who blends humor, Indian mythology, and philosophical insights to explore the complexities of human nature. Passionate about social commentary and introspection, the author uses vivid imagery and playful satire to remind us that true fulfillment comes not from demanding shortcuts, but from self-improvement and sincere effort.

Comments

  1. बहुत खूबसूरत और जरूरी बात आप ने इतने सहज तरीके से कह कर दिलोदिमाग पर जो दस्तक दी है उसका असर बहुत गहराई तक हुआ है। सच में ही हम जिंदगी को overload कर उसे hang कर देते हैं जिससे दिमाग बोझिल और दिल खाली रहता है। शायद आज के समय की वक्त की यही सबसे बड़ी tregedy है। जिस का सरल समाधान आप ने बताया इसके लिए आप का शुक्रिया करना तो बनता है क्योंकि आभार व्यक्त करना भी उतना ही जरूरी है जितना अपने आप को रिफ्रेश करना। साधुवाद

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