तुम पे प्यार भी आता है, ग़ुस्सा भी!"

"तुम पे प्यार भी आता है, ग़ुस्सा भी!"

लेखक: संजय शर्मा

शाम की हल्की ठंडक हवा में घुल रही थी। देवभूमि की गोद में बसी हमारी कॉलोनी—ऊँचाई पर बसे लाल छतों वाले टेरेस्ड कॉटेज, खिड़कियों से झरती गरम रोशनी, घुमावदार सड़क, और नीचे दूर तक फैली नीली झील, जिसके किनारे पेड़ों की परछाइयाँ हौले-हौले झूल रही थीं।

आज मंगलवार था। मेरी पत्नी अपनी पूजा में मग्न थी, व्रत के नियमों का पालन करते हुए। उधर, मैंने दोस्तों के साथ डिनर प्लान कर लिया था। जैसे ही उसे बताया, उसका चेहरा तन गया।

"तुम पे प्यार भी आता है, ग़ुस्सा भी!" उसने नाराज़गी से कहा और फिर दीया जलाने में व्यस्त हो गई।

ये शब्द मेरे दिमाग़ में घूमते रहे, जैसे पहाड़ियों पर गूंजती कोई पुरानी गूँज।

मैंने अख़बार मोड़कर बालकनी से बाहर देखा—वही रोज़ की कॉलोनी, वही शिकायती चेहरे, वही ठहरी हुई समस्याएँ।

"पहले जैसे लोग नहीं रहे!" शर्मा जी ने एक दिन भुनभुनाते हुए कहा।


सिंह अंकल रोज़ अपनी पार्किंग को लेकर नाराज़ दिखते—"हर किसी की गाड़ी बेधड़क खड़ी रहती है, कोई नियम नहीं, कोई अनुशासन नहीं!"


जीवन जी सफाई व्यवस्था से परेशान थे—"झील तक जाने वाला रास्ता देखो, कूड़े का अंबार लगा है!"


मिसेज़ असलम को बिजली विभाग से शिकायत थी—"ये बिजली बार-बार क्यों चली जाती है?"


जनरल साहब सिक्योरिटी को लेकर चिंतित थे—"ये सिक्योरिटी वाले हर किसी को कॉलोनी में घुसने देते हैं, कोई पूछता भी नहीं!"

हर घर, हर चेहरे पर शिकायतेँ थीं।

मैंने ठंडी साँस भरी और झील की ओर जाने वाली सड़क पर उतरने लगा। सड़क पर सूखे पत्ते सरसराहट कर रहे थे। पानी की नीरवता में एक अजीब-सा सुकून था, लेकिन अंदर कुछ बेचैन कर रहा था।

तभी पीछे से जनरल साहब की भारी आवाज़ आई

"सिर्फ शिकायत करने से कुछ नहीं बदलेगा। जब तक हम खुद बदलाव नहीं लाएँगे, ये कॉलोनी, ये सड़कें, ये झील—सब वैसे ही रहेंगे।"

अगले दिन, जनरल साहब झाड़ू लेकर सड़क पर उतर चुके थे। लोग देखते रहे—कुछ मुँह बिचकाकर, कुछ ताने कसकर। 

लेकिन धीरे-धीरे यह सिर्फ एक व्यक्ति की मुहिम नहीं रही।

मेरा बेटा, जो यूनिवर्सिटी का CEO था, मेरे बाबूजी की सीख को याद करते हुए बोला—
"पापा, अगर एक आदमी बदलाव ला सकता है, तो हम सब मिलकर क्यों नहीं?"

जैसे एक चिंगारी भड़क उठी।

अब हर कोई अपने हिस्से का दीप जलाने लगा।

शर्मा जी, जो बस बुराई निकालते थे, उन्होंने कॉलोनी का गेट ठीक करवाने का बीड़ा उठा लिया।


गुप्ता जी, जो सिर्फ़ बहस करते थे, पार्क की रौशनी ठीक कराने में जुट गए।


मिसेज़ असलम, जो अकेलापन महसूस करती थीं, बच्चों को पढ़ाने लगीं।


मेरी पत्नी, जिसने रिश्तों की ठंडक की सबसे ज़्यादा शिकायत की थी, अब कॉलोनी की औरतों की छोटी बहन बन चुकी थी।

धीरे-धीरे शिकायती चेहरे बदलने लगे।

जनरल साहब ने सिक्योरिटी गार्ड्स से कहा—
"बेटा, नौकरी से ज़्यादा ज़िम्मेदारी भी है इसमें। आने-जाने वालों पर ध्यान दो, कॉलोनी को सुरक्षित रखो।"


अब चौकीदार हर अजनबी से पूछताछ करने लगे।
हर घर से कूड़ा उठाने का एक शेड्यूल बनाया गया।

शर्मा अंकल ने "ड्राइवर ट्रेनिंग" सेशन रखवाया, ताकि सब गाड़ियाँ सही जगह पार्क करें।

मिश्रा जी ने गार्डनिंग क्लब बनाया, जिससे पार्क में हरियाली बढ़ने लगी।

अब लोग कमियाँ निकालने के बजाय एक-दूसरे की तारीफ करने लगे थे—

"भाईसाहब, आपकी पहल से पार्क कितना अच्छा लग रहा है!"
"बिजली की दिक्कत सच में कम हो गई!"
"अब सफाई वाले भी सही समय पर आ रहे हैं!"

रिश्तों की शिकायतेँ भी मिटने लगीं। जब बाहर बदलाव आता है, तो अंदर भी असर पड़ता है।

पहले मैं और मेरी पत्नी भी छोटी-छोटी बातों पर बहस कर लेते थे—
"तुम हमेशा फोन में ही लगे रहते हो!"
"तुम्हें मेरी पसंद की परवाह ही नहीं!"

लेकिन अब…
"अच्छा सुनो, मिसेज़ असलम को शाम को झील तक घुमा लाओ।"
"तुम मंदिर चलोगे?"

शिकायतें कम हो रही थीं, साथ बढ़ रहा था।

पचास साल की खुशियाँ, शिकायतेँ नहीं

छह महीने बाद वही जनरल साहब अपनी 50वीं शादी की सालगिरह मना रहे थे।
कॉलोनी रोशनी से जगमगा रही थी। गिटार बज रहा था, बच्चे हँसी-ठिठोली कर रहे थे, और लोग एक-दूसरे को गले लगा रहे थे।

आज पहली बार किसी ने कहा नहीं कि "म्यूजिक धीरे करो, 10 बज गए हैं!"
आज हर कोई खुश था, हर कोई शामिल था।

मंगलवार का नया संकल्प

आज फिर मंगलवार था, और हमेशा की तरह, मैंने दोस्तों के साथ डिनर प्लान कर लिया था।

पत्नी ने हल्की हँसी के साथ कहा, "आज वाइन मत लेना।"

"क्यों?"

"शिवजी की देवभूमि में कुछ तो त्याग करना चाहिए ना।"

मैं मुस्कुरा दिया।

"ठीक है, अब से हर मंगलवार ड्रिंक्स नहीं।"

पत्नी ने ताली बजाई।
"देखा, अब तुम भी बदल रहे हो!"

रात गहराने लगी थी। दूर, झील का पानी हल्की लहरों से हिल रहा था। और उससे भी ऊपर, छोटा कैलाश—शिव का निवास, शांत, अटल, स्थिर।

मानो हमें आशीर्वाद दे रहा हो।

मैंने अपनी पत्नी की ओर देखा।

"तुम पर प्यार भी आता है, और ग़ुस्सा भी," मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

वह हँस पड़ी, "ग़ुस्सा अब थोड़ा कम हुआ?"

"हाँ... अब हमें भी अपनी ज़िंदगी में बदलाव लाना होगा। सिर्फ़ शिकायतें नहीं, समाधान भी ढूँढने होंगे।"

मैंने बालकनी से देखा—दूर 'छोटा कैलाश' की चोटी पर चाँद की हल्की रौशनी पड़ रही थी।

हिमालय की चोटी पर चमकती चांद की चमक, नीचे देवदार के घने जंगल, और बीच में यह कॉलोनी, जहाँ अब लोग सिर्फ़ शिकायतें नहीं, समाधान भी ढूँढते थे।

"देवभूमि के इन पहाड़ों से हमने सीखा—अगर बदलाव चाहिए, तो पहल हमें खुद करनी होगी।"

"चाहे कॉलोनी हो या रिश्ता, बस शिकायतें करने से कुछ नहीं बदलेगा। हमें समाधान का हिस्सा बनना होगा।"


About the Author

Sanjay Shharma is an engineer, management graduate, and second-generation entrepreneur with over 35 years of experience in building products, markets, teams, and institutions. 

This narrative is the creative work of a storyteller who blends humor, Indian mythology, and philosophical insights to explore the complexities of human nature. Passionate about social commentary and introspection, the author uses vivid imagery and playful satire to remind us that true fulfillment comes not from demanding shortcuts, but from self-improvement and sincere effort.


Comments

Popular Posts